VMOU Paper with answer ; VMOU HI-01 Paper BA 1st Year , vmou History important question

VMOU HI-01 Paper BA 1st Year ; vmou exam paper 2023

vmou exam paper

नमस्कार दोस्तों इस पोस्ट में VMOU BA First Year के लिए इतिहास ( HI-01 , History of India (Earliest Times to 1200 A.D. ) का पेपर उत्तर सहित दे रखा हैं जो जो महत्वपूर्ण प्रश्न हैं जो परीक्षा में आएंगे उन सभी को शामिल किया गया है आगे इसमे पेपर के खंड वाइज़ प्रश्न दे रखे हैं जिस भी प्रश्नों का उत्तर देखना हैं उस पर Click करे –

Section-A

प्रश्न-1. भगवान बुद्ध का जन्म कहाँ हुआ था?

उत्तर:-भगवान बुद्ध का जन्म लुम्बिनी नामक स्थान पर नेपाल में हुआ था।

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प्रश्न-2. स्याद्वाद क्या है?

उत्तर:-स्याद्वाद जैन दर्शन में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है जिसका अर्थ होता है ‘शायद कहना’ या ‘ऐसा लगता है’। यह दर्शन यह मानता है कि सत्य को अनेक प्रकार से देखा जा सकता है और हर दृष्टिकोण से उसका अपना आलंब होता है। स्याद्वाद के अनुसार, कोई भी व्यक्ति सत्य का केवल एक पहलू देखता है और अन्य पहलु को नहीं देखता, इसलिए उसके द्वारा कहा गया उस सत्य का केवल एक पहलू ही सच नहीं हो सकता। इस प्रकार, स्याद्वाद सत्य की अनेक पहलुओं को मानने वाला सिद्धांत है।

प्रश्न-3. भारत की दो प्रसिद्ध महाकाव्य का नाम बताएँ ?

उत्तर:- रामायण , महाभारत

प्रश्न-4. भारतीय सिंधु सभ्यता के दो स्थलों का नाम बताएँ ?

उत्तर:-

  1. मोहनजोदड़ो
  2. हड़प्पा
प्रश्न-5. वर्णाश्रम प्रणाली क्या है?

उत्तर:-वर्णाश्रम प्रणाली एक पुरानी सामाजिक प्रणाली है जो भारतीय समाज में प्राचीन काल से चली आ रही है। इस प्रणाली के अनुसार, समाज को चार वर्णों में विभाजित किया जाता है: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। इन वर्णों के अनुसार व्यक्तियों का धार्मिक और सामाजिक कार्य तय किया जाता है। वर्णों के साथ ही आश्रमों का भी विभाजन होता है, जिनमें ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास शामिल हैं। यह प्रणाली व्यक्ति के जीवन के विभिन्न चरणों में उनके कर्तव्यों और जीवनशैली को नियंत्रित करने के लिए निर्मित है।

प्रश्न-6. गुप्त सिक्कों की दो विशेषताएँ का नाम बताएँ ?

उत्तर:- गुप्त सिक्कों की दो विशेषताएँ –

  1. दूसरी तरफ गुप्त सिक्के पर चंद्रमा और सूर्य की छवियाँ अक्सर पाई जाती थीं, जिनका मतलब राजा की दिव्यता और शक्ति को प्रकट करना था।
  2. गुप्त सिक्कों पर देवी लक्ष्मी की चित्रण भी देखी जाती थी, जिससे यह प्रतीत होता है कि धार्मिकता और धन की प्राप्ति में एक गहरा संबंध था।
प्रश्न-7. चार वेदों के नाम लिखिए ?

उत्तर:- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद

प्रश्न-8. प्राचीन भारत के कोई दो अभिलेखों का नाम लिखिए ?

उत्तर:- प्राचीन भारत के अभिलेखों का नाम-

1. चतुर्दश शिला अभिलेख2. कलिंग अभिलेख (धौली और जूनागढ़ के अभिलेख)
3. स्तम्भ अभिलेख4. गुहालेख
5. लघुशिला अभिलेख6. लघु स्तम्भ अभिलेख
प्रश्न-9. महावीर स्वामी का जन्म कहाँ हुआ ?

उत्तर:- भगवान महावीर का जन्म 540 ईसा पूर्व में ‘वज्जि साम्राज्य’ में कुंडग्राम के राजा सिद्धार्थ और लिच्छवी राजकुमारी त्रिशला के यहाँ हुआ था।

प्रश्न-10. रामायण का लेखक कौन था ?

उत्तर:-

प्रश्न-11. दो वैदिक देवियों के नाम लिखिए ?

उत्तर:- अदिति, उषा, सरस्वती आदि के रूप में वेदों में अनेक देवियों का भी उल्लेख है, और उनके स्तवन में भी अनेक मन्त्रों का निर्माण किया गया है।

प्रश्न-12. त्रिरत्न क्या है ?

उत्तर:- त्रिरत्न (तीन रत्न) बौद्ध धर्म के सबसे महत्त्वपूर्ण अंग हैं। इन त्रिरत्नों पर ही बौद्ध धर्म आधारित हैं। त्रिरत्न :- बुद्ध, धम्म और संघ.

प्रश्न-13. नीतिसार’ पुस्तक के लेखक कौन थे ?

उत्तर:- रचयिता का नाम ‘कामंदकि‘ अथवा ‘कामंदक’ है

प्रश्न-14. ‘वेदांग’ क्या है ?

उत्तर:- वेदाङ्ग हिन्दू धर्म ग्रन्थ हैं। वेदार्थ ज्ञान में सहायक शास्त्र को ही वेदांग कहा जाता है। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द और निरूक्त – ये छः वेदांग है। शिक्षा – इसमें वेद मन्त्रों के उच्चारण करने की विधि बताई गई है। परंपरागत रुप से शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द और निरूक्त – ये छ: वेदांग है। शिक्षा – इसमें वेद मन्त्रों के उच्चारण करने की विधि बताई गई है । कल्प – वेदों के किस मन्त्र का प्रयोग किस कर्म में करना चाहिये, इसका कथन किया गया है।

प्रश्न-15.

उत्तर:-

प्रश्न-16.

उत्तर:-

प्रश्न-17.

उत्तर:-

प्रश्न-18.

उत्तर:-

प्रश्न-19.

उत्तर:-

प्रश्न-20.

उत्तर:-

Section-B

प्रश्न-1. वैदिक राजनीति पर प्रकाश डालें ?

उत्तर:- वैदिक युग में राजनीति का महत्वपूर्ण स्थान था और यह धार्मिक और सामाजिक आदर्शों पर आधारित था। वैदिक राजनीति के कुछ मुख्य पहलु निम्नलिखित हैं:

  1. राजा का कर्तव्य: वैदिक युग में राजा का प्रमुख कर्तव्य धर्म की पालन करना था। राजा को अपने राज्य के प्रति सच्ची प्रेम और उसके प्रगति का ध्यान रखना था। वे अपने प्रजा की रक्षा करने, न्याय दिलाने और समाज के विकास के लिए प्रतिबद्ध थे।
  2. यज्ञ और धर्म: राज्य के प्रशासन में यज्ञों का महत्वपूर्ण योगदान था। यज्ञों के द्वारा देवताओं का पुण्य प्राप्त होता था और राजा के कर्तव्यों की प्रदान की जाती थी। यज्ञों के द्वारा समाज में सामंजस्य और शांति की स्थापना होती थी।
  3. सभा और समिति: राज्य के प्रबंधन के लिए सभा और समिति का उपयोग किया जाता था। यहाँ पर विभिन्न विषयों पर चर्चा होती थी और निर्णय लिए जाते थे।
  4. वर्ण और आश्रम व्यवस्था: वर्ण और आश्रम व्यवस्था भी राजनीति में महत्वपूर्ण थी। वर्ण व्यवस्था के अनुसार लोगों के कर्तव्य और अधिकार तय किए जाते थे और आश्रम व्यवस्था में व्यक्ति के जीवन के विभिन्न चरणों को निर्दिष्ट किया जाता था।
  5. धर्मिक शास्त्रों का महत्व: वेदों और उपनिषदों में राजनीति के सिद्धांतों का प्रस्तुतन होता था। वेदों के अनुसार धर्मपरायण राजा ही सम्राट कहलाते थे और वे अपने प्रजा के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध रहते थे।

वैदिक राजनीति धार्मिक और सामाजिक आदर्शों पर आधारित थी और उसका मुख्य उद्देश्य समाज की सामाजिक और आध्यात्मिक समृद्धि था।

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प्रश्न-2. गुप्त कला पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए ?

उत्तर:-गुप्त काल की कई मूर्तियाँ हैं जिनका एक अगल ही इतिहास है, और ये मूर्तियाँ गुप्त काल के कालक्रम के लिए एक तल चिह्न के रूप में काम करते हैं। गुप्त कला की मूर्तियाँ गुप्त युग (जो 318-319 ई॰ पू॰) की हैं, और कभी-कभी उनमें उस समय के शासक का भी उल्लेख मिलता है। मूर्तियों के अलावा सिक्के भी उस कालक्रम के महत्वपूर्ण सूचक हैं।

भारतीय इतिहास में गुप्त साम्राज्य कला का एक महत्वपूर्ण पहलु रहा है। गुप्त साम्राज्य (चौखंबा काल) 4वीं से 6वीं सदी ईसा पूर्व के बीच विकसित हुआ था और इस काल को भारतीय कला की उन्नति का स्वर्णिम युग माना जाता है।

मुख्य विशेषताएँ:

  1. मंदिर विन्यास: गुप्त काल में हिन्दू मंदिरों का निर्माण शुरू हुआ और विशिष्ट शैली में उनका निर्माण हुआ। उनमें शिखर, गोपुर, और आलिंगन की विशेषताएँ थीं। उदाहरणस्वरूप, दशावतार मंदिर और पार्वतीश्वर मंदिर में उन्नत विन्यास का प्रदर्शन होता है।
  2. चित्रकला: गुप्त काल की चित्रकला महत्वपूर्ण थी। पत्थर, तंबे, सोने, और आभूषणों पर उनके कुशलता से नक्काशी की गई। सोने की सुन्दर कढ़ाई, मिट्टी के स्कल्पचर, और पत्थर की आदृश्यता में कला का उच्चतम स्तर प्रकट होता है।
  3. वास्तुकला: गुप्त साम्राज्य कला में वास्तुकला का महत्वपूर्ण स्थान था। सड़कों, नगरों, और नगरीय योजनाओं के निर्माण में वास्तुकला की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
  4. सोने और रजत की आदृश्यता: सोने और रजत की विशेष आदृश्यता गुप्त कला में दिखाई देती है। सोने और रजत के आभूषणों, सिक्कों, और मूर्तियों का निर्माण किया गया जो सुंदरता और कौशलता की बेहतरीन प्रतिनिधिता थी।
  5. आलंबकला: आलंबकला गुप्त कला का एक अन्य महत्वपूर्ण हिस्सा था। आलंबकला में चांदी, सोने, मनियों से बने आभूषणों की श्रेणियाँ आती थीं, जो भव्यता को और भी बढ़ाती थी।

गुप्त कला का प्रतिष्ठानित उत्कृष्टता, दक्षता, और समृद्धि की प्रतिष्ठा को प्रकट करता है। इस समय की कला ने भारतीय सांस्कृतिक धरोहर में एक स्थान अर्जित किया और आगामी कला के विकास की मार्गदर्शा की

प्रश्न-3. त्रिपक्षीय संघर्ष के बारे में आप क्या जानते हैं ?

उत्तर:-अरबों के आक्रमण के उपरान्त भारतीय प्रायद्वीप के अन्तर्गत तीन महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ थीं- गुजरात एवं राजपूताना के गुर्जर-प्रतिहार, दक्कन के राष्ट्रकूट एवं बंगाल के पाल। कन्नौज पर अधिपत्य को लेकर लगभग 200 वर्षों तक इन तीन महाशक्तियों के बीच होने वाले संघर्ष को ही त्रिपक्षीय संघर्ष कहा गया हैवंशों के विभिन्न सम्राटों में भारत-सम्राट कहलाने और कन्नौज को प्राप्त करने की प्रतिष्ठा को प्राप्त करने के लिए संघर्ष हुआ जो त्रिदलीय अथवा त्रिपक्षीय संघर्ष कहलाया । यह संघर्ष 8वीं सदी के अन्तिम समय से आरम्भ होकर 10वीं सदी के अन्त तक लगभग 200 वर्षों तक चला। कन्नौज पर आक्रमण करने का अवसर मिला ।

प्रश्न-4. चोल प्रशासन का मूल्यांकन कीजिए ?

उत्तर:-चोल ग्रामीण प्रशासन बहुत व्यवस्थित और सुविकसित था और यह चोल प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी। गांवों की विधानसभाओं के संबंध में, चोल अभिलेखों में उल्लेख है कि विधानसभाओं को ‘उर’ और ‘सभा’ या ‘महासभा’ कहा जाता था जो समुदाय के वयस्क पुरुष सदस्यों की जनसभा थी।

चोल राजवंश का प्रशासन भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण और सकारात्मक माना जाता है। चोल साम्राज्य का प्रशासन निम्नलिखित पहलुओं में मूल्यांकन किया जा सकता है:

1. आर्थिक विकास: चोल राजवंश ने आर्थिक दृष्टि से भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके शासनकाल में व्यापार, वाणिज्य और शिल्प का प्रबल विकास हुआ। उन्होंने विश्वस्तरीय व्यापारिक संबंध स्थापित किए और बाहुबलियों के माध्यम से समृद्धि प्राप्त की।

2. समाज और संस्कृति: चोल राजवंश के प्रशासन के दौरान समाज और संस्कृति की समृद्धि हुई। कावेरी और ताम्रपर्णी नदी क्षेत्र में चोल साम्राज्य का स्थान था, जिससे कृषि और अन्य गतिविधियों का विकास हुआ। चोल राजाओं ने संस्कृति को भी प्रोत्साहित किया और कला, साहित्य, और विज्ञान में उनकी उन्नति हुई।

3. शिक्षा और ज्ञान: चोल साम्राज्य में शिक्षा का प्रचार किया गया और उन्होंने विद्यालयों और शिक्षा संस्थानों का निर्माण किया। उन्होंने विद्यार्थियों को विभिन्न क्षेत्रों में शिक्षा दी और विज्ञान, गणित, और कला के क्षेत्र में उन्नति को प्रोत्साहित किया।

4. नौका-यातायात और व्यापार: चोल साम्राज्य के नौका-यातायात और व्यापार के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान था। कावेरी और ताम्रपर्णी नदीघाटों का चोलों ने संवर्धन किया और वाणिज्यिक संबंधों की स्थापना की।

5. राजनीति और शासन: चोल राजवंश के शासक नीतिशास्त्र, शासन कला, और शासन की उच्चतम गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध थे। उनका प्रशासन समर्पित, सामर्थ्यपूर्ण, और प्रजाप्रिय था।

प्रश्न-5.पूर्वमध्यकालीन अर्थव्यवस्था का वर्णन कीजिए ?

उत्तर:-भारत के आर्थिक जीवन में कृषि का प्रमुख स्थान रहा है। पूर्व – मध्यकालीन अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी । सामंती प्रथा के विकास और भूमि – अनुदान की प्रथा के कारण कृषि पर बोझ अत्यधिक बढ़ गया। अधिक-से-अधिक भूमि को कृषि योग्य बनाए जाने के प्रयास किये गये।

पूर्वमध्यकालीन अर्थव्यवस्था: व्यापार, कृषि और समृद्धि का काल

पूर्वमध्यकालीन काल (अक्सर ‘मध्यकाल’ के रूप में जाना जाता है) विश्व इतिहास की उन उपयुक्त महत्वपूर्ण घटनाओं के बीच होता है जो प्राचीन यूरोप और अफ्रीका, एशिया और अरब सभ्यताओं की विभिन्न धाराओं के बीच व्यापार, शैली, संस्कृति और आर्थिक गतिविधियों के परिवर्तनों का परिणाम होते हैं।

अर्थव्यवस्था का आधार: पूर्वमध्यकाल में अर्थव्यवस्था की मुख्य आधारभूत धारा कृषि और ग्रामीण आधारित थी। अधिकांश लोग कृषि काम करते थे और खेती, चारागाही और पशुपालन उनकी मुख्य आर्थिक गतिविधियाँ थीं।

व्यापार और व्यापारिक संबंध: पूर्वमध्यकाल में व्यापार एक महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि था। व्यापारिक संबंध भारतीय उपमहाद्वीप से दूसरे क्षेत्रों तक बनाए गए थे, जैसे कि सिल्क रोड का संबंध भारत और पश्चिमी एशिया के बीच था। अरब देशों का भारत से व्यापार भी था और यहाँ से मसाले, बारूद, गहनों आदि का निर्यात किया जाता था।

समृद्धि और नानीवाली जमीन: पूर्वमध्यकाल में समृद्धि के स्रोत नानीवाली जमीन थी, जिनमें शहरों और नगरों के आसपास फसल उगाई जाती थी। ये जमीन उच्च उपजाऊ थी और नागरिकों को पोषण और आर्थिक संसाधन प्रदान करती थीं।

श्रमिक व्यवस्था और सामाजिक वर्ग: श्रमिक वर्ग भी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा था। शिल्पकार, किसान, उद्यमिता, व्यापारी, और श्रमिक सभी वर्ग मिलकर समृद्धि की ओर काम करते थे।

पूर्वमध्यकाल में अर्थव्यवस्था गहरी और विविध थी, जिसमें कृषि, व्यापार, शिल्प, और सेवाएँ एक साथ अपना योगदान देती थीं। इस आधार पर ही सामाजिक संरचना बनी और उसके साथ ही आर्थिक विकास भी होता गया।

प्रश्न-6. अरब आक्रमण पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए ?

उत्तर:-अरबों का भारत पर पहला सफल आक्रमण मुहम्मद-बिन-कासिम के नेतृत्व में 712 ई० में हुआ। अरबों ने सिंध को जीत लिया जिसपर उस काल में दाहिर का शासन था। भारत पर अरबवासियों के आक्रमण का मूल उद्देश्य लूट-पाट करना एवं इस्लाम का प्रचार करना था। 715 ई० में खलीफा की मृत्यु के पश्चात कासिम वापस लौट गया।

अरब आक्रमण: भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना

भारतीय इतिहास में अरब आक्रमण एक महत्वपूर्ण घटना रहा है, जिसने भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक, और राजनीतिक धारा को प्रभावित किया। 8वीं से 10वीं शताब्दी तक, अरब क्षेत्र से आए मुस्लिम आक्रमणकारी शासक ने भारतीय उपमहाद्वीप में विभिन्न हिस्सों को आक्रमण किया था।

इस आक्रमण की मुख्य वजह थी धर्म और व्यापार। इस कारणवश, अरबी व्यापारियों और आक्रमणकारियों ने भारत की समृद्ध व्यापारिक और सांस्कृतिक धरोहर की ओर ध्यान दिया।

सबसे महत्वपूर्ण आक्रमण कारी शासक थे मुहम्मद बिन कासिम और महमूद गजनवी। मुहम्मद बिन कासिम ने 711 ईसा में सिन्ध प्रांत की जीत हासिल की और अरब आक्रमण की पहली श्रेणी के रूप में भारत में प्रवेश किया। महमूद गजनवी ने 11वीं सदी में कई बार भारत में आक्रमण किए, और उनके आक्रमण से भारतीय सुन्दरता और संस्कृति की महत्वपूर्ण चीजों की लूट हुई।

इस आक्रमण के परिणामस्वरूप भारत में मुस्लिम साम्राज्यों की स्थापना हुई, जैसे कि दिल्ली सलतनत, मुघल साम्राज्य आदि। यह साम्राज्य भारतीय समाज और संस्कृति को प्रभावित करते रहे और उनके साथ ही मुस्लिम सांस्कृतिक प्राथमिकताएं भी आई।

इस प्रकार, अरब आक्रमण ने भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना को प्रमुखता दी और भारतीय समाज और संस्कृति पर अद्वितीय प्रभाव डाला।

प्रश्न-7. प्राचीन भारतीय इतिहास को जानने के साहित्यिक स्रोतों का वर्णन कीजिए ?

उत्तर:- प्राचीन भारत का सांस्कृतिक इतिहास लिखने के लिए पुराण बहुत उपयोगी हैं। पुराण अपने वर्तमान रूप में संभवतः ईसा की तीसरी और चौथी शताब्दी में लिखे गये । प्राचीन भारतीय इतिहास का ज्ञान प्राप्त करने के लिये जैन साहित्य भी बौद्ध साहित्य की ही तरह महत्त्वपूर्ण हैं। उपलब्ध जैन साहित्य प्राकृत एवं संस्कृत भाषा में हैं।

प्राचीन भारतीय इतिहास को जानने के लिए विभिन्न साहित्यिक स्रोत हैं, जिनमें वेद, उपनिषद, धर्मशास्त्र, पुराण, इतिहासकारों की रचनाएँ आदि शामिल हैं। यहाँ प्रमुख साहित्यिक स्रोतों का वर्णन किया गया है:

  1. वेद: वेद प्राचीन भारतीय संस्कृति के मौलिक धार्मिक ग्रंथ हैं। चार प्रमुख वेद हैं – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ये ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए हैं और विभिन्न आध्यात्मिक और धार्मिक विषयों पर आधारित हैं।
  2. उपनिषद: उपनिषद वेदांत दर्शन की प्रमुख रचनाएँ हैं जो वेद की शिक्षा को व्याख्यान करती हैं। इनमें आत्मा, ब्रह्म, योग, मोक्ष आदि के विषयों पर गहराई से चर्चा की गई है।
  3. धर्मशास्त्र: मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति आदि धर्मशास्त्र के प्रमुख स्रोत हैं। ये ग्रंथ समाज के नियम, आचार-व्यवहार, धर्म, कर्म आदि के विषयों पर दिशा-निर्देश प्रदान करते हैं।
  4. पुराण: पुराण भारतीय संस्कृति, इतिहास, पौराणिक कथाएँ और धार्मिक ज्ञान के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। महाभारत, रामायण, विष्णु पुराण, शिव पुराण, देवी भागवतम् आदि प्रमुख पुराण हैं।
  5. इतिहासकारों की रचनाएँ: प्राचीन भारत के इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास की विविधता को विवरणपूर्ण ढंग से दर्शाया है। उनमें चाणक्य, मेघसंधि, बाणभट्ट, बृहत्त, कालिदास, अमरसिंह आदि शामिल हैं।

ये साहित्यिक स्रोत प्राचीन भारत की समाज, संस्कृति, धर्म और इतिहास की जानकारी प्रदान करते हैं और हमें उस समय की जीवनशैली और विचारधारा की समझ में मदद करते हैं।

प्रश्न-8. हर्षवर्धन की उपलब्धियाँ बताइए ?

उत्तर:-गौड़देश के शशांक की मृत्यु के बाद हर्षवर्धन ने उड़ीसा, मगध, वोदरा, कोंगोंडा (गंजम) और बंगाल पर विजय प्राप्त की। बाद में, उन्होंने नेपाल के शासक को पदच्युत कर दिया और उनसे सम्मान का स्वागत किया। उन्होंने उत्तर भारतीय राजवंशों को परास्त करके अपना अधिकार स्थापित किया।

प्रश्न-9. वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति का मूल्यांकन कीजिए ?

उत्तर:-वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति ससमाज में अत्यन्त ऊँची थी और उन्हें अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त थी। उन्हें धार्मिक क्रियाओं में पुरोहितों एवं ऋषियों का दर्जा प्राप्त था। वे धर्मशास्त्रार्थ में भी भाग लेती थीं । स्त्रियों का सम्मानप्रद स्थान प्राप्त था ।वैदिक काल के दौरान , महिला एक उच्च स्थिति में थी , वह लंबे समय तक स्थिर नहीं रह सकती थी। धर्मसूत्रों ने बाल विवाह का निर्देश दिया , ताकि महिलाओं की शिक्षा बाधित हो और उनकी शिक्षा सामान्य स्तर पर आए क्योंकि उन्हें लिखने और पढ़ने के अवसर नहीं मिले , जिसके कारण वेदों के ज्ञान को असंभव बना दिया गया

प्रश्न-10. अशोक के ‘धम्म’ की व्याख्या कीजिए ?

उत्तर:-सम्राट अशोक ने कहा कि प्रत्येक मनुष्य को अपने माता-पिता की सेवा करनी चाहिए, शिक्षकों का सम्मान करना चाहिए और अहिंसा एवं सच्चाई का पालन करना चाहिए. उन्होंने सभी मनुष्य से पशु वध और बलि से बचने के लिए कहा. उन्होंने जानवरों, नौकरों और कैदियों के साथ मानवीय व्यवहार न करने की बात कही

प्रश्न-11. शुंग कला पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए ?

उत्तर:- शुंग कला अदालत की संस्कृति से पूरी तरह से मुक्त थी और बौद्ध विचारों से संश्लेषित लोक कला से बढ़ी। शुंग काल के दौरान विशाल मूर्तिकला का विकास किया गया। यद्यपि 112 वर्षों के शुंगों के शासनकाल में बौद्ध धर्म की गिरावट देखी गई थी, फिर भी बौध्द चैत्य भवन का निर्माण शुंग काल में किया गया। भरहुत स्तूप दूसरी शताब्दी ई

शुंग वंश भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण है और उसकी कला उस समय की सांस्कृतिक धारा को प्रकट करती है। शुंग वंश ने मौर्य वंश के उत्तराधिकारी के रूप में स्थान पाया और उनकी शासनकाल 2 वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 1 वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक थी। शुंग वंश के शासकों ने भारतीय कला और संस्कृति को प्रोत्साहित किया और उसके विकास में योगदान किया।

शुंग कला की मुख्य विशेषताएँ-

1. शिल्पकला: शुंग काल में शिल्पकला की विकास व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के प्रति लोगों की दृष्टि को प्रकट करती है। मूर्तियों, स्तूपों, रेलिफ पर नक्काशी आदि में उनका योगदान था।

2. स्तूपों का निर्माण: शुंग काल में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए स्तूपों का निर्माण किया गया। स्तूपों पर चित्रित नक्काशी और मूर्तियाँ धर्मिक और सामाजिक संदेश को प्रस्तुत करती थीं।

3. विहार और उपासना स्थल: शुंग शासकों ने बौद्ध संघ के लिए विहारों की स्थापना की, जो ध्यान और उपासना के स्थल के रूप में उपयोग में आते थे।

4. चित्रकला: शुंग काल की चित्रकला ने मुरल पेंटिंग्स और अन्य कलाओं में विकास किया। यह मुरल पेंटिंग्स धार्मिक और कल्पनात्मक विषयों पर आधारित थीं।

5. धार्मिक भावना का प्रकटीकरण: शुंग काल की कला में धार्मिक भावना का प्रकटीकरण होता है, जो धर्म, ध्यान, और आध्यात्मिकता के आदर्शों को प्रमोट करता है।

शुंग काल की कला ने भारतीय संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया और उस समय की सांस्कृतिक प्रवृत्तियों को प्रकट किया

प्रश्न-12. बौद्ध धर्म की प्रमुख शिक्षाओं की विवेचना कीजिए ?

उत्तर:-बौद्धकाल में शिक्षा मनुष्य के सर्वागिण विकास का साधना थी। इसका उद्देश्य मात्र पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करना नहीं था, अपितु मनुष्य के स्वास्थ्य का भी विकास करना था। बौद्ध युग में शिक्षा व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक,बौद्धिक तथा आध्यात्मिक उत्थान का सर्वप्रमुख माध्यम थी

बौद्ध धर्म प्रमुखतः गौतम बुद्ध के उपदेशों पर आधारित है और उनकी शिक्षाओं के चार मुख्य प्रमुख हिस्से हैं:

1. चतुरार्य सत्य (चार आर्यसत्य): यह चार प्रमुख आर्यसत्य बौद्ध धर्म के मूलभूत आदर्श हैं। ये निम्नलिखित हैं:

  • दुःख सत्यम् (दुःख की सत्यता): जीवन में दुःख होना निर्वाण की प्राप्ति के लिए मुख्य बाधा है। बुद्ध ने इस आर्यसत्य की उपदेशीन की कि सभी जीवन में दुःख है और इसे परित्याग करना महत्वपूर्ण है।
  • समुदय सत्यम् (दुःख का कारण समुदय): बुद्ध ने यह उपदेश दिया कि दुःख का मुख्य कारण त्रिष्णा और आसक्ति में है, जिसका समाधान आत्म-निग्रह के माध्यम से किया जा सकता है।
  • निरोध सत्यम् (दुःख की निवृत्ति का सत्य): दुःख की निवृत्ति का समाधान आत्म-निग्रह और त्रिष्णा के अबाधित होने में है।
  • मार्ग सत्यम् (दुःख की निवृत्ति का मार्ग): दुःख की निवृत्ति के लिए अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करना चाहिए, जिसमें सम्यक दृष्टि, संयम, समाधि, सत्य, संग्रह, तपस्, प्रहिंसा, और दान शामिल हैं।

2. अनित्यता (अनित्यवाद): बौद्ध धर्म में अनित्यता की सिद्धांतिक दृष्टि है, जिसका मतलब है कि सभी ध्यानशील धर्म जीवनों की अनित्यता को प्रतिपादित करते हैं। सभी ध्यानशील धर्म नाशवादी होते हैं और वस्तुत: अस्थायी होते हैं।

3. अनात्मवाद (अनात्मवाद): इस सिद्धांत के अनुसार, सभी धार्मिक और दार्शनिक प्राणियों का आत्मा अस्तित्वहीन होता है। इसका तात्त्विक अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति या प्राणी के अंतर्निहित आत्मा का कोई निरंतर और स्थायी रूप नहीं होता है।

4. निर्वाण (मोक्ष): बौद्ध धर्म में निर्वाण मोक्ष के समर्थन में है, जिसमें सब दुःखों की निवृत्ति होती है। यह मोक्ष अहिंसा, ध्यान, समाधि, और ब्रह्मचर्य के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।

ये बौद्ध धर्म की प्रमुख शिक्षाएँ हैं जो गौतम बुद्ध के उपदेशों में प्रकट होती हैं और जीवन को उद्धारणीय और ध्यानशील बनाने का प्रयास करती हैं।

प्रश्न-13. मौर्य प्रशासन पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए ?

उत्तर:-मौर्य प्रशासन (Mauryan Administration in Hindi) एक विशाल सेना के रखरखाव के लिए जाना जाता था। प्लिनी ने अपने खाते में उल्लेख किया है कि चंद्रगुप्त मौर्य ने लगभग 9,000 हाथी, 30,000 घुड़सवार और 6,00,000 पैदल सैनिकों को बनाए रखा था। यह भी उल्लेख है कि मौर्य प्रशासन के दौरान लगभग 800 रथ थे।

मौर्य साम्राज्य का प्रशासन:

मौर्य वंश भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण राजवंशों में से एक था जिसका प्रशासन बहुत ही व्यवस्थित और प्रभावशाली था। मौर्य साम्राज्य के प्रशासकों ने एक शक्तिशाली प्रशासन प्रणाली की स्थापना की जो विभिन्न क्षेत्रों में सुशासन की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान किया।

चंद्रगुप्त मौर्य: मौर्य साम्राज्य की शुरुआत चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा हुई थी। उन्होंने मगध क्षेत्र को एकत्रित किया और नंदन वन में आच्छादित होकर मौर्य साम्राज्य की नींव रखी। उनका प्रशासन शक्तिशाली और सुरक्षित था। उन्होंने विभिन्न राज्यों को अपने अधीन किया और साम्राज्य की सीमाएँ विस्तृत की।

चाणक्य (कौटिल्य): चंद्रगुप्त मौर्य के प्रमुख सलाहकार और चर्चित शिक्षक चाणक्य (कौटिल्य) थे। उन्होंने एक व्यवस्थित प्रशासन प्रणाली का निर्माण किया जिसमें शिलालेखों, आदर्शों, और विधियों का महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने ‘अर्थशास्त्र’ की रचना की जिसमें विभिन्न आर्थिक और प्रशासनिक विषयों को विस्तार से व्याख्या की गई थी।

अशोक मौर्य: मौर्य साम्राज्य के तीसरे सम्राट अशोक का प्रशासन भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपने पिता की तरह ही विस्तारशील और सशक्त प्रशासन प्रणाली का पालन किया और साम्राज्य की सीमाएँ विस्तारित की। अशोक के प्रशासन में सामाजिक और आर्थिक विकास को महत्व दिया गया।

धर्म प्रसार: अशोक का एक महत्वपूर्ण कार्य था बौद्ध धर्म के प्रसार का समर्थन करना। उन्होंने स्थानिक और बाहरी धर्मिक स्थलों को बनवाया और धर्म संबंधी आदर्शों की प्रोत्साहना की।

अद्वितीय प्रशासन प्रणाली: मौर्य साम्राज्य की प्रशासन प्रणाली शक्तिशाली थी और उसमें संविदानिक और प्रशासनिक व्यवस्था का पालन किया जाता था। नियुक्त प्रशासकों और अधिकारियों का प्रशासन किया जाता था जो विभिन्न क्षेत्रों में शासन का प्रबंधन करते थे।

मौर्य साम्राज्य के प्रशासन की यह विशेषताएँ इसे एक शक्तिशाली और व्यवस्थित राज्य बनाती हैं जिसने भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान दर्ज किया

प्रश्न-14. गुप्त नरेश समुद्रगुप्त की उपलब्धियों का वर्णन कीजिए ?

उत्तर:-

  1. आर्यावर्त (उत्तर भारत) का प्रथम अभियान समुद्रगुप्त ने सर्वाप्रथम आर्यावर्व (उत्तर भारत) के नौ राज्यों को पराजित किया। …
  2. आटविक राज्यो पर विजय …
  3. दक्षिण के राज्य …
  4. पूर्वी सीमान्त राज्य …
  5. गणराज्य …
  6. उत्तर पश्चिम सीमान्त के राज्य …
  7. विदेशी राज्यो से सम्बन्ध …
  8. अश्वमेघ यज्ञ
प्रश्न-15. प्राचीन भारत में स्त्रियों के कानूनी अधिकारों की व्याख्या कीजिए ?

उत्तर:- संपत्ति में महिलाओं को समान अधिकार था। शिक्षा के क्षेत्र में भी महिलाओं को बराबरी का हक प्राप्त था। उन्हें शिक्षा ग्रहण करने, अपना भविष्य बनाने तथा शिक्षिका के रूप में काम करने का अधिकार प्राप्त था। ऋग्वेद में कई सारी विदुषी स्त्रियों का वर्णन है जिसमें लोपामुद्रा, घोषा, अपाला इत्यादि शामिल हैं। प्राचीन भारत में नारी की सामाजिक स्थिति उच्च थी

समाज में नारी को सम्मानजनक पद भी प्राप्त होते थे और प्रतिष्ठा भी । पुरुष वर्ग की प्रेरणा का स्रोत भी नारी ही होती थी । नारी का नाम पुरुष के साथ बड़े आदर से और पुरुष से पहले लिया जाता था, यथा- राधा-कृष्ण, सीता राम । अत्यंत प्राचीन काल में पत्नी को चल सम्पत्ति समझा जाता था, अतः उसके स्वयं संपत्ति की स्वामिनी होने का प्रश्न नहीं उठता। वैदिक काल में स्त्रियों को उपहार रूप में दिया जाता था ।

‘ महाभारत में भी धृतराष्ट्र कृष्ण का आदर करने के लिए एक सौ दासिया देने को उद्धत हो जाते है । 2 पति को पत्नी का पूर्ण रूप से स्वामी समझा जाता था इस काल की कुछ महिलायें आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का अनुष्ठान करती हुई दर्शन का अध्ययन करती थीं ।

अनेक शिक्षित महिलायें अध्यापन कार्य का भी अनुसरण करती थीं । किन्तु ब्राह्मण ग्रन्थों में यह भी बताया गया है कि स्त्री, पुरुष की अपेक्षा दुर्बल एवं भावक मस्तिष्क की होती है तथा बाह्य आकर्षणों के प्रति आसानी से लुभा जाती है

प्रश्न-16.

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प्रश्न-17.

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प्रश्न-18

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प्रश्न-19

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प्रश्न-20

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Section-C

प्रश्न-1. प्राचीन भारतीय इतिहास को जानने के साहित्यिक स्त्रोतों का वर्णन कीजिए ?

उत्तर:-

(जिस भी प्रश्न का उत्तर देखना हैं उस पर क्लिक करे)

प्रश्न-2. बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धांतों का मूल्यांकन कीजिए ?

उत्तर:- 1-सम्यक दृष्टि- वस्तुओं के वास्तविक रूप का ध्यान करना सम्यक दृष्टि है। 2-सम्यक संकल्प- आसक्ति, द्वेष तथा हिंसा से मुक्त विचार रखना। 4-सम्यक कर्मान्त- दान, दया, सत्य, अहिंसा आदि सत्कर्मों का अनुसरण करना। 5-सम्यक आजीव- सदाचार के नियमों के अनुकूल जीवन व्यतीत करना

बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धांतों का मूल्यांकन:

1. चतुरार्य सत्य (चार आर्य सत्य): बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धांत में पहला सिद्धांत चतुरार्य सत्य, यानी सत्य, संयम, आचार्य, और प्रज्ञा की महत्वपूर्णता को प्रमोट करता है। यह सिद्धांत नैतिकता, सहयोग, और समाज की सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण था।

2. अनित्यता और दुःख का सिद्धांत: बौद्ध धर्म में दुःख का मूल कारण अनित्यता और विनाशी प्राणियों की अस्थायिता में माना गया है। यह सिद्धांत मानव जीवन की स्थितिकरण में मदद करने का प्रयास करता है, क्योंकि यदि अनित्यता की ज्ञान हो तो हम उसके प्रति समझदारी और विवेकपूर्ण दृष्टिकोण से समझ पा सकते हैं।

3. अहिंसा और मौन का सिद्धांत: अहिंसा और मौन को बौद्ध धर्म के महत्वपूर्ण सिद्धांतों में मान्यता दी गई है। अहिंसा के पालन से ही समाज में शांति और सामंजस्य की स्थापना हो सकती है। मौन आत्म-सांयम की दिशा में महत्वपूर्ण है, जिससे हम अपनी मानसिक शांति पा सकते हैं।

4. प्रतीत्यसमुत्पाद (संयुक्त संबंध का सिद्धांत): यह सिद्धांत बताता है कि सभी घटनाएँ एक निरंतर संबंध में हैं और एक घटना का होना दूसरी घटना पर निर्भर करता है। यह सिद्धांत आत्म-उद्दीपना और निगमन के दिशा में महत्वपूर्ण है, क्योंकि हम अपने कर्मों के परिणामों को समझ सकते हैं और उन्हें सुधार सकते हैं।

5. निर्वाण (मोक्ष) का सिद्धांत: निर्वाण बौद्ध धर्म में मोक्ष की स्थिति को कहता है, जिसमें सभी दुःखों का नाश हो जाता है। यह सिद्धांत मन की शांति और सुख की प्राप्ति की दिशा में महत्वपूर्ण है।

बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धांत सामाजिक सद्गुणों, नैतिकता, और आत्म-साक्षात्कार की महत्वपूर्णता को प्रमोट करते हैं। यह सिद्धांतों ने समाज में सुधार और व्यक्तिगत उन्नति की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रश्न-3. राजपूत कालीन समाज एवं संस्कृति पर एक लेख लिखिए ?

उत्तर:-राजपूत काल में राजा अपने कुल तथा परिवार के व्यक्तियों को उच्च पदों पर आसीन करता था। साधारण जनता शासन के कार्यों में भाग नहीं लेती थी तथा राजनैतिक विषयों के प्रति भी उदासीन ही रहती थी। जिसके परिणामस्वरूप राजपूत युग में मंत्रिपरिषद का महत्त्व घट गया था

राजपूत कालीन समाज एवं संस्कृति

राजपूतों का काल सिंघासनों और वीरता की चित्रित राजनीति के रूप में प्रसिद्ध है। राजपूत समाज और संस्कृति ने उत्तर भारतीय इतिहास को अपने वीरता, आदर्शों, और शौर्य की कहानियों से सजीव किया।

राजपूत समाज: राजपूत समाज की नींव उनके सैन्य और साम्राज्य क्षेत्र में रखी गई थी। ये राजपूत शासक समृद्धि का स्रोत बनाने के लिए कृषि, पशुपालन और व्यापार में अवलंबित थे। उनकी सामाजिक वर्गीकरण व्यावसायिक गतिविधियों के आधार पर होती थी जैसे कि क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य आदि।

राजपूत संस्कृति: राजपूत समाज की संस्कृति धार्मिकता, कला, साहित्य और वास्तुकला में विशिष्ट थी। वे वीर भक्ति की दृष्टि से आदर्श बने और धर्म की आदर्श शिक्षाएँ देते थे।

1. वीरता और युद्ध परंपरा: राजपूतों की वीरता और युद्ध परंपरा उनकी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा था। वे युद्ध में अद्वितीय शौर्य दिखाते थे और अपने धर्म की रक्षा के लिए तैयार रहते थे।

2. गर्व और आत्म-सम्मान: राजपूत समाज में आत्म-सम्मान और गर्व की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उनका समाजिक स्थान और मान्यता उनके वीरता और यदि आपके पास और प्रतिष्ठा से जुड़ा था।

3. संस्कृति की समृद्धि: राजपूत संस्कृति ने विविध आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं के साथ-साथ कला और साहित्य को भी समृद्धि दिलाई। उनकी वास्तुकला, वस्त्रकला, और संगीत में महत्वपूर्ण योगदान था।

4. समाजिक प्रथाएँ और आदर्शों की पालन: राजपूत समाज में सामाजिक प्रथाएँ और आदर्शों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। वे धर्म, आदर्श, और कुलीनता की मान्यता को प्राथमिकता देते थे और उन्हें पालन करते थे।

5. शौर्य और वीरता की कहानियाँ: राजपूत समाज में वीरता और शौर्य की कहानियाँ महत्वपूर्ण भाग बनती थीं। इन कहानियों के माध्यम से युवा पीढ़ियाँ उनके आदर्शों को प्रेरित होती थीं।

राजपूत काल की समाज और संस्कृति में वीरता, धर्म, और आदर्शों की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जो उनके समाज को एक अलग पहचान देती है। इसके साथ ही उनकी कला, साहित्य, और वास्तुकला ने भारतीय संस्कृति को और भी समृद्ध किया।

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