VMOU Paper with answer ; VMOU HI-04 Paper BA 2nd Year , vmou History important questions

VMOU HI-04 Paper BA 2nd Year ; vmou exam paper 2023

vmou exam paper

नमस्कार दोस्तों इस पोस्ट में VMOU BA 2nd Year के लिए इतिहास ( HI-04 , History of India (1740-1947 AD) का पेपर उत्तर सहित दे रखा हैं जो जो महत्वपूर्ण प्रश्न हैं जो परीक्षा में आएंगे उन सभी को शामिल किया गया है आगे इसमे पेपर के खंड वाइज़ प्रश्न दे रखे हैं जिस भी प्रश्नों का उत्तर देखना हैं उस पर Click करे –

Section-A

प्रश्न-1. रामकृष्णमिशन का संस्थापक कौन था ?

उत्तर:-रामकृष्ण मिशन के संस्थापक स्वामी विवेकानंद थे। (1 मई 1897)

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प्रश्न-2. सत्यार्थ प्रकाश किसने लिखा ?

उत्तर:-सत्यार्थ प्रकाश की रचना स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 1875 ई में हिन्दी में की थी।सत्यार्थ प्रकाश आर्य समाज का प्रमुख ग्रन्थ है

प्रश्न-3. सत्य शोधक समाज के संस्थापक कौन थे?

उत्तर:-सत्य शोधक समाज के संस्थापक ज्योतिराव फुले थे।

प्रश्न-4. नादिरशाह ने भारत पर कब आक्रमण किया ?

उत्तर:-नादिरशाह ने भारत पर 1739 में आक्रमण किया था। नादिर शाह 1738 में भारत की ओर बढ़े। उन्होंने 1739 में काबुल, गजनी, लाहौर जैसे मुगल साम्राज्य की पश्चिमी सीमाओं पर कब्जा कर लिया।

प्रश्न-5. रामकृष्ण मिशन की स्थापना कब हुई ?

उत्तर:-1 May 1897 , रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1897 में हुई थी। इस मिशन की स्थापना स्वामी विवेकानंद द्वारा की गई थी, जो स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य और प्रेरणा स्रोत थे। रामकृष्ण मिशन का मुख्य उद्देश्य मानव सेवा, धार्मिक शिक्षा, और सामाजिक सुधार को बढ़ावा देना है।

प्रश्न-6. वेदव्यास भूमिका किसने लिखा ?

उत्तर:-दयानंद सरस्वती

प्रश्न-7. महलवाड़ी व्यवस्था को परिभाषित कीजिए ?

उत्तर:-इस व्यवस्था के अंतर्गत गाँव के मुखिया के साथ सरकार का लगान वसूली का समझौता होता था। जिसे महालवाड़ी बंदोबस्त/व्यवस्था कहा गया। इसमें गाँव के प्रमुख किसानों को भूमि से बेदखल करने का अधिकार था। महालवाड़ी व्यवस्था के तहत लगान का निर्धारण महाल या संपूर्ण गाँव की ऊपज के आधार पर किया जाता था।

प्रश्न-8. तिलक का नारा क्या था ?

उत्तर:-‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा‘, जो की लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने वर्ष 1916 में ये नारा दिया था।

प्रश्न-9. स्वतंत्रता संग्राम के दो नेताओं के नाम लिखिए ?

उत्तर:-लाला लाजपत राय (पंजाब), बाल गंगाधर तिलक (महाराष्ट्र), और बिपिन चन्द्र पाल (बंगाल) , नेताजी सुभाष चंद्र बोस

प्रश्न-10. प्रार्थना समाज कितने स्थापित किया ?

उत्तर:-आत्माराम पांडुरंग

प्रश्न-11. प्लासी का युद्ध कब लड़ा गया ?

उत्तर:-प्लासी का यह युद्ध 23 जून 1757 को हुआ था. इस युद्ध में एक ओर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना थी तो दूसरी ओर थी बंगाल के नवाब की सेना. कंपनी की सेना ने रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में नबाव सिराज़ुद्दौला को हरा दिया था.

प्रश्न-12. दयानंद सरस्वती कौन थे ?

उत्तर:- दयानंद सरस्वती (Swami Dayanand Saraswati) भारतीय संत, धार्मिक विचारक, और आर्य समाज के संस्थापक थे। उनका जन्म 12 फरवरी 1824 को हुआ था और उनका मृत्यु 30 अक्टूबर 1883 को हुआ। स्वामी दयानंद सरस्वती ने वेदों के महत्व को पुनर्जागरूक किया और उन्होंने वेदों को अपने जीवन के मार्गदर्शक माना। उन्होंने वेदों के शिक्षाओं का प्रचार किया और अन्य धार्मिक प्राथमिकताओं के खिलाफ उठे।

स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य समाज को वेदों के आदर्शों के प्रति पुनर्जागरूक करना था। वे वेदों के अद्भुत ज्ञान और विज्ञान को प्रमोट करते थे और धर्म, समाज, और राजनीति में न्याय, समानता, और सत्य की प्रमुखता पर जोर देते थे।

स्वामी दयानंद सरस्वती की महत्वपूर्ण पुस्तक है “सत्यार्थ प्रकाश” जिसमें वे अपने धार्मिक और सामाजिक विचारों को प्रस्तुत किये थे। उनके विचारों ने भारतीय समाज को बदल दिया और आर्य समाज एक महत्वपूर्ण सामाजिक सुधार आंदोलन का हिस्सा बन गया।

प्रश्न-13. बटलर आयोग का गठन कब हुआ ?

उत्तर:-सन् 1927 में

प्रश्न-14. स्वतंत्रता आन्दोलन की दो महिला नेताओं के नाम लिखिए ?

उत्तर:-रानी लक्ष्मीबाई सरोजिनी नायडू और बेगम हजरत महल

प्रश्न-15. रैयतवाडी व्यवस्था को परिभाषित कीजिए ?

उत्तर:-रैयतवाड़ी व्यवस्था के तहत लगभग 51 प्रतिशत भूमि आई। इसमें रैयतों या किसानों को भूमि का मालिकाना हक प्रदान किया गया। अब किसान स्वयं कंपनी को भू-राजस्व देने के लिये उत्तरदायी थे। इस व्यवस्था में भू-राजस्व का निर्धारण उपज के आधार पर नहीं बल्कि भूमि की क्षेत्रफल के आधार पर किया गया। रैयतवाड़ी पद्धति में भूमि का मालिकाना हक किसानों के पास था। भूमि को क्रय विक्रय एवं गिरवी रखने की वस्तु बना दी ग‌ई। इस पद्धति में भू राजस्व का दर वैसे तो 1/3 होता था, लेकिन उसकी वास्तविक वसूली ज्यादा थी।

प्रश्न-16. रैयतवाड़ी व्यवस्था की मुख्य विशेषताएं क्या है ?

उत्तर:-(1) रैयतवाड़ी व्यवस्था मैं जब तक शुष्क भूमिका लगान देता रहता है तब तक भूमि से संबंधित समस्त अधिकार उसे प्राप्त रहते हैं। (2) रैयतवाड़ी व्यवस्था में समग्र भूमि पर राज्य का एकाधिकार होता है। (3) इस प्रथा में राज्य एवं कृषक के बीच कोई मध्यस्थ न होने से प्रत्यक्ष संबंध होता है।

प्रश्न-17. द्विराष्ट्र सिद्धांत क्या था ?

उत्तर:-द्विराष्ट्र सिद्धांत या दो क़ौमी नज़रिया भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों के हिन्दुओं से अलग पहचान का सिद्धांत है।

प्रश्न-18. बक्सर का युद्ध कब और किसके मध्य लड़ा गया ?

उत्तर:-बक्सर का युद्ध 22/23 अक्टूबर 1764 में बक्सर नगर के आसपास ईस्ट इंडिया कंपनी के हैक्टर मुनरो और मुगल तथा नवाबों की सेनाओं के बीच लड़ा गया था। बंगाल के नबाब मीर कासिम, अवध के नबाब शुजाउद्दौला, तथा मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना अंग्रेज कम्पनी से लड़ रही थी।

प्रश्न-19. ‘वेदों की ओर लौटो’ का नारा किसने दिया ?

उत्तर:-स्वामी दयानंद सरस्वती ने नारा दिया- “वेदों की ओर वापस लौटो”।

प्रश्न-20. हैदर अली कौन था ?

उत्तर:-हैदर अली दक्षिण भारतीय मैसूर राज्य के सुल्तान और वस्तुतः शासक थे। उनका जन्म का नाम हैदर नाइक था। वो अपने सैन्य कौशल के कारण काफी प्रतिष्ठित हुये और इसी कारण मैसूर के शासकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसके परिणामस्वरूप वो दलवई (कमांडर इन चीफ अर्थात सेनाप्रमुख) पद पदोन्नत हुये।

प्रश्न-21. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम सत्र की अध्यक्षता किसने की ?

उत्तर:-व्योमेश चन्द्र बनर्जी ने

प्रश्न-22. भारत में ब्रिटिश काल के दौरान तीन भू-राजस्व पद्धतियों के नाम बताइए ?

उत्तर:-महलवाड़ी व्यवस्था , स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था , रैयतवाड़ी व्यवस्था

प्रश्न-23. लाहौर की संधि कब हस्ताक्षरित हुई ?

उत्तर:-9 मार्च 1846 को लाहौर की संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। संधि के अनुसार, सिख कश्मीर और हजारा और जालंधर दोआब को अंग्रेजों को सौंपने के लिए सहमत हुए। इस संधि के कारण ही कोहिनूर हीरा अंग्रेजों को सौंप दिया गया था।

प्रश्न-24. रामकृष्ण मिशन की स्थापना कब और किसने की थी ?

उत्तर:-1 मई 1897 , रामकृष्ण परमहंस के परम् शिष्य स्वामी विवेकानन्द ने की

प्रश्न-25. प्रार्थना समाज क्या है ?

उत्तर:-प्रार्थना समाज की स्थापना सन् 1867 में बम्बई में की गई थी। यह भक्ति परम्परा का समर्थक था।इसने जातीय बन्धनों को खत्म करने और बाल विवाह के उन्मूलन ( के लिए प्रयास किया। प्रार्थना समाज ने महिलाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित किया और विधवा विवाह पर लगी पाबंदी के खिलाफ आवाज उठाई।

Section-B

प्रश्न-1. असहयोग आन्दोलन पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए ?

उत्तर:-अंग्रेजों के अत्याचार के राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने एक अगस्त 1920 को असहयोग आंदोलन शुरू किया था। इसकी विशेषता यह थी कि अंग्रेजों की क्रूरताओं के खिलाफ लड़ने के लिए केवल अहिंसक साधनों को अपनाया गया था। नई दिल्ली। अंग्रेजों के अत्याचार के राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने एक अगस्त 1920 को असहयोग आंदोलन शुरू किया था।

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प्रश्न-2. पानीपत के तृतीय युद्ध के बारे में आप क्या जानते हैं ?

उत्तर:-पानीपत का तीसरा युद्ध 14 जनवरी, 1761 को पानीपत में दिल्ली से लगभग 60 मील (95.5 किमी) उत्तर में मराठा साम्राज्य और अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली जिसे अहमद शाह दुर्रानी भी कहा जाता है, के बीच हुआ था। मुख्य कारण – यहाँ अहमद शाह अब्दाली के सूबेदार शासन कर रहे थे। अतः इससे अहमद शाह अब्दाली को प्रत्यक्ष चुनौती मिली। अतः अब्दाली ने पंजाब पर आक्रमण कर पुनः अधिकार कर लिया। आगे बढ़कर अब्दाली ने दिल्ली पर भी अधिकार कर लिया और मराठों को चुनौती दी।

प्रश्न-3. पेशवा बाजीराव प्रथम के व्यक्तित्व का मूल्यांकन कीजिए?

उत्तर:-पेशवा बाजीराव प्रथम का व्यक्तित्व अत्यन्त प्रभावशाली था; तथा उनमें जन्मजात नेतृत्वशक्ति थी। अपने अद्भुत रणकौशल, अदम्य साहस और अपूर्व संलग्नता से, तथा प्रतिभासम्पन्न अनुज श्रीमान चिमाजी साहिब अप्पा के सहयोग द्वारा शीघ्र ही उसने मराठा साम्राज्य को भारत में सर्वशक्तिमान् बना दिया। इसके लिए उन्हें अपने दुश्मनों से लगातार लड़ाईयाँ करना पड़ी।

प्रश्न-4. खिलाफत आंदोलन की विवेचना कीजिए ?

उत्तर:-खिलाफत आंदोलन का मुख्य उद्देश्य तुर्की के खलीफा पद को पुनः स्थापित करना था। खिलाफत आंदोलन 1919 से 1924 तक चला था। हालाँकि इस आंदोलन का सीधा सम्बन्ध भारत से नहीं था। इस का प्रारम्भ 1919 में अखिल भारतीय कमिटी का गठन करके किया गया था।

1922 ईस्वी में मुस्तफ़ा कमाल पाशा के नेतृत्व में तुर्की के लोगों ने हीं खलीफा को उसकी सत्ता से बेदखल कर दिया था जिसके बाद खिलाफ़त आन्दोलन स्वतः हीं समाप्त हो गया. लेकिन खिलाफ़त आन्दोलन ने उस समय भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता को स्थापित कर दिया और राष्ट्रीय आन्दोलन को आगे बढ़ाने में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की.

प्रमुख कारण- हालांँकि प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्क साम्राज्य विभाजित हो गया और तुर्की को अलग कर दिया गया तथा खलीफा को सत्ता से हटा दिया गया था। इससे मुस्लिम नाराज हो गए तथा इसे खलीफा का अपमान माना। अली भाइयों, शौकत अली और मोहम्मद अली ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ खिलाफत आंदोलन को शुरू कर दिया।

प्रश्न-5. भारत में आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष का वर्णन कीजिए ?

उत्तर:-भारत में आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष को कर्नाटक युद्ध के नाम से जाना जाता है, ये युद्ध उस समय प्रारम्भ हुआ जब यूरोप में दोनों देशों के मध्य ऑस्ट्रिया पर अधिकार को लेकर संघर्ष शुरू हुआ। भारत में कुल 3 युद्ध लड़े गये जोकि वर्ष 1746-1763 के मध्य हुए। इसके परिणाम स्वरूप फ्रांसीसियों का भारत से पूर्णतः सफाया हो गया। अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के मध्य । संघर्ष का प्रमुख कारण उनकी आपसी व्यापारिक स्पर्धा थी। दोनों ही कम्पनियों की आकांक्षा थी कि वे भारत के विदेशी व्यापार पर एकाधिकार स्थापित कर लें।

प्रश्न-6. महलवाड़ी व्यवस्था का वर्णन कीजिए ?

उत्तर:-इस व्यवस्था के अंतर्गत गाँव के मुखिया के साथ सरकार का लगान वसूली का समझौता होता था। जिसे महालवाड़ी बंदोबस्त/व्यवस्था कहा गया। इसमें गाँव के प्रमुख किसानों को भूमि से बेदखल करने का अधिकार था। महालवाड़ी व्यवस्था के तहत लगान का निर्धारण महाल या संपूर्ण गाँव की ऊपज के आधार पर किया जाता था।

लॉर्ड विलियम बेंटिक ने भारत में भू-राजस्व की महालवाड़ी व्यवस्था की शुरुआत की। वे भारत के गवर्नर-जनरल (1828-35) थे और 1833 में पेश किए गए थे। यह ब्रिटिश भारत के मध्य प्रांत, उत्तर-पश्चिम सीमा, आगरा, पंजाब, गंगा घाटी, आदि में शुरू किया गया था।

महालवाड़ी व्यवस्था या प्रणाली का सबसे बड़ा दोष यह था कि गांव के नम्बरदार एवं बड़े लोगों को विशेषाधिकार मिल गए थे क्योंकि यही लोग सरकार के समझौता पर हस्ताक्षर करते थे। गांव के छोटे किसान अनपढ़ थे एवं उनका दर्जा भी इस व्यवस्था मे कम हो गया था। नम्बरदार तथा बड़े लोग इस व्यवस्था का दुरूपयोग कर अपना स्वार्थ सिद्ध करने लगे।

भूमि को ग्राम समुदाय का स्वामित्व माना जाता था । कृषक भूमि का एकमात्र स्वामी होता था। प्रत्येक किसान ने कर का अपना उचित हिस्सा अदा किया। ग्राम प्रधान या ग्राम नेताओं का एक समूह कर एकत्र करने और उन्हें कंपनी सरकार को भेजने का प्रभारी था।

प्रश्न-7. महाराजा रणजीत सिंह की उपलब्धियाँ बताइए ?

उत्तर:-महाराजा रणजीत सिंह की विरासत का एक बड़ा हिस्सा कश्मीर, हजारा, पेशावर और खैबर पख्तूनख्वा पर उनकी विजय और उसके बाद उत्तर-पश्चिमी सीमा का सुदृढ़ीकरण है। उन्होंने 1819 में कश्मीर, 1820 में हजारा और 1834 में पेशावर और खैबर पख्तूनख्वा पर विजय प्राप्त की। रंजित सिंग जी ने पुरे पुजाब को एक किया और सिख राज्य की स्थापना की. महाराजा रणजीत ने अफगानों के खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ीं और पेशावर समेत पश्तून क्षेत्र पर अधिकार कर लिया. ऐसा पहली बार हुआ था कि पश्तूनो पर किसी गैर मुस्लिम ने राज किया हो। उसके बाद उन्होंने पेशावर, जम्मू कश्मीर और आनंदपुर पर भी अधिकार कर लिया। खनिवास दरबार: महाराजा रणजीत सिंह ने पंजाब में अपने दरबार को सुखनिवास कहा और यहां पंजाब के सिख साम्राज्य के प्रमुख केंद्र के रूप में उन्होंने उसका पुनर्निर्माण किया।

प्रश्न-8. विवेकानंद की शिक्षाओं का मूल्यांकन कीजिए ?

उत्तर:-स्वामी विवेकानंद के शिक्षाओं का महत्वपूर्ण भाग भारतीय समाज और व्यक्तिगत विकास के क्षेत्र में है। उन्होंने आध्यात्मिकता, सामाजिक न्याय, और मानवता के महत्व को बढ़ावा दिया। यहां स्वामी विवेकानंद की मुख्य शिक्षाओं का अध्ययन किया जा रहा है:

  1. आध्यात्मिकता: स्वामी विवेकानंद ने आध्यात्मिकता के महत्व को बताया और यह सिखाया कि सच्चा धर्म अन्याय, निर्धर्म, और असत्य के खिलाफ होना चाहिए। उन्होंने आत्मा की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया और ध्यान और साधना के माध्यम से आत्मा के प्राप्ति को प्रमोट किया।
  2. विश्व सामाजिक एकता: स्वामी विवेकानंद ने विश्व भर में सभी मानवों के बीच सामाजिक एकता की बजाय बात की और यह सिखाया कि हम सभी एक ही परमात्मा के बच्चे हैं। उन्होंने विविधता को समृद्धि का स्रोत माना और भारतीय संस्कृति को दुनिया के साथ साझा करने की प्रेरणा दी।
  3. कर्मयोग: स्वामी विवेकानंद ने कर्मयोग की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया और यह सिखाया कि कर्म सही तरीके से किया जाए तो यह आत्मा के विकास में मदद करता है। उन्होंने कर्म का महत्व और आत्म-समर्पण की महत्वपूर्ण भूमिका को बताया।
  4. ध्यान और योग: स्वामी विवेकानंद ने ध्यान और योग के माध्यम से मानव जीवन को उच्च दर्जे की ओर ले जाने की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने ध्यान के माध्यम से मानव चेतना को शुद्ध करने और आत्मा के साथ एकात्मता प्राप्त करने की महत्वपूर्ण तकनीकों को सिखाया।
  5. सेवा: स्वामी विवेकानंद ने सेवा का महत्व बताया और यह सिखाया कि सच्चा धर्म और आध्यात्मिकता का अर्थ है दूसरों की सेवा करना। उन्होंने युवाओं को समाज सेवा में लगने की प्रेरणा दी और वे अपने जीवन को एक उद्देश्यवादी और सेवा केंद्रित जीवन के रूप में दें।
प्रश्न-9. सविनय अवज्ञा आन्दोलन पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए ?

उत्तर:-सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil disobedience movement in Hindi) का प्रारंभ महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में किया गया था। इस आंदोलन की शुरुआत गांधी जी के दांडी मार्च यात्रा से हुई थी। गांधीजी तथा साबरमती आश्रम के 78 अन्य सदस्यों ने 12 मार्च,1930 से अहमदाबाद से 241 मील की दूरी पर स्थित एक गांव के लिए यात्रा प्रारंभ कर दी। सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत दांडी मार्च से हुई थी, जिसे नमक सत्याग्रह के रूप में भी जाना जाता है । दांडी मार्च, मोहनदास करमचंद गांधी के नेतृत्व में शुरु हुआ अहिंसक आंदोलन था। यह नमक पर ब्रिटिशो के एकाधिकार के खिलाफ शुरु हुआ,अहिंसक विरोध प्रदर्शन आंदोलन था

प्रश्न-10. स्थायी बन्दोबस्त की विवेचना कीजिए ?

उत्तर:-स्थाई बंदोबस्त के अनुसार मालगुजारी वसूल करने का कार्य स्थाई रूप से जमीदारों को दे दिया गया और तत्कालीन मालगुजारी का प्रतिशत भाग राज्य का स्थाई अंत निर्धारित कर दिया गया। इस तरह मालगुजारी की रकम स्थाई रूप से जमीदारों को दे दी गई, उस में कभी कोई कमी एवं वृद्धि नहीं हो सकती थी। इसी व्यवस्था को स्थाई बंदोबस्त कहते हैं। इस व्यवस्था के अंतर्गत जमींदारों को एक निश्चित राशि पर भूमि दे दी गई। जमींदार की मृत्यु के पश्चात उसके उत्तराधिकारी को भूमि का स्वामित्व प्राप्त हो जाता था। जमींदारों को यह निश्चित राशि एक निश्चित समय को सूर्यास्त के पहले चुका देनी पड़ती थी नहीं तो उनकी जमीन नीलाम कर दी जाती थी इस कानून को सूर्यास्त कानून कहा जाता था।

प्रश्न-11. आजाद हिन्द फौज की गतिविधियों का वर्णन कीजिए ?

उत्तर:- आजाद हिन्द फौज भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बनाई गई थी और इसकी गतिविधियों में भाग लिया जाता है। इस फौज का गठन 1942 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा किया गया था और इसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम को एक मजबूत आवाज देना और भारतीय स्वतंत्रता सेनाओं का संगठन करना था।

आजाद हिन्द फौज की मुख्य गतिविधियां निम्नलिखित थी:

  1. सभ्य सत्याग्रह: फौज के सदस्यों ने अपने आपको अनशन, धरना, और सभ्य सत्याग्रह के माध्यम से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। इससे स्वतंत्रता संग्राम को एक मजबूत आवाज मिली और लोगों का समर्थन प्राप्त हुआ।
  2. विदेश में जाना: नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के सदस्यों को विदेश भेजा, जैसे कि जर्मनी, सिंगापुर, और जापान, ताकि वहाँ से भारतीय स्वतंत्रता सेनाओं के साथ मिलकर लड़ सकें।
  3. आजादी के लिए युद्ध: आजाद हिन्द फौज के सदस्य नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए युद्ध किया और उन्होंने अलग-अलग युद्ध क्षेत्रों में अपनी देश और स्वतंत्रता के लिए लड़े।
  4. रेडियो भाषण: नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के मेंबर्स को निरंतर उत्साहित किया और उनके संवादों को भारत के लोगों तक पहुँचाने के लिए रेडियो भाषणों का आयोजन किया।
  5. नेताजी की मौत: 1945 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत हो गई, जिससे फौज का प्रबंधन कमजोर हो गया और फिर 1947 में भारत स्वतंत्र हो गया।

आजाद हिन्द फौज ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उनके संघर्षों और बलिदान के बावजूद, वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अहम हीरो रहे हैं।

प्रश्न-12. प्लासी के युद्ध के प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए ?

उत्तर:- प्लासी के युद्ध के कारण

  1. (1) सिराजुद्दौला के विरुद्ध अंग्रेजों का षड्यन्त्र –
  2. (2) अंग्रेजों और नवाब सिराजुद्दौला में तनाव –
  3. (3) अंग्रेजों द्वारा किलेबन्दी –
  4. (4) कासिम बाजार व कलकत्ता पर अधिकार –
  5. (5) काल कोठरी की घटना –
प्रश्न-13. आर्य समाज की भारतीय समाज को देन का वर्णन कीजिए ?

उत्तर:-आर्य समाज ने वेदों का पुनरुद्धार किया। वेदों के बारे में हुई भ्रान्त धारणाओं को तर्क प्रमाण एवं युक्ति से निरस्त किया। वेदों का यथार्थ और सच्चा स्वरूप संसार के सामने रखा। धार्मिक देनआर्य समाज ने धर्म के क्षेत्र में फैले हुए अन्धविश्वास, ढोंग, पाखण्ड और रूढिवादिता को समाप्त कर धर्म का सच्चा स्वरूप जनता के सामने रखा। आर्य समाज जसे जागरूक मंच से उन्होंने देश में फैली कुरीतियों और धर्म के नाम पर पाखंडों को जड़ से उखाड़ फेंकने के साथ-साथ गुलामी की बेड़ियों से जकड़ी मातृभूमि को विदेशियों से मुक्त कराने का आह्वान किया। आर्य समाज वैदिक धर्म पर आधारित वह संगठन है, जो धर्म, अधर्म की व्याख्या तर्क की तुला पर तौलकर करता है

प्रश्न-14. राष्ट्रीय आन्दोलन में महात्मा गांधी की भूमिका पर एक लेख लिखिए ?

उत्तर:-

प्रश्न-15. पेशवा बाजीराव प्रथम के बारे में आप क्या जानते हैं ?

उत्तर:-पेशवा बाजीराव प्रथम (श्रीमन्त पेशवा बाजीराव बल्लाळ भट्ट) (1700 – 1740) महान सेनानायक थे। वे 1720 से 1740 तक मराठा साम्राज्य के चौथे छत्रपति शाहूजी महाराज के पेशवा (प्रधानमन्त्री) रहे। इनका जन्म चितपावन कुल के ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनको ‘बाजीराव बल्लाळ’ तथा ‘थोरले बाजीराव’ के नाम से भी जाना जाता है।

प्रश्न-16. “धन निस्कासन के सिद्धांत का मूल्यांकन कीजिए ?

उत्तर:-भारत में ब्रिटिश शासन के समय, भारतीय उत्पाद का वह हिस्सा जो जनता के उपभोग के लिये उपलब्ध नहीं था तथा राजनीतिक कारणों से जिसका प्रवाह इंग्लैण्ड की ओर हो रहा था, जिसके बदले में भारत को कुछ नहीं प्राप्त होता था, उसे आर्थिक निकास या धननिष्कासन (Drain of Wealth) की संज्ञा दी गयी। धन निष्कासन में किसी देश से सोने, चाँदी जैसी कीमती धातुएँ देश से बाहर भेजा जाता है, ऐसा होने का मुख्य कारण था भारत में विदेशी नियम और प्रशासन का होना तथा धन के निष्कासन के कारण भारत में पूँजी संचय नहीं हो पाया जिस कारण औद्योगिक विकास नहीं हो सका और देश में गरीबी तेजी से बढ़ने लगी।

प्रश्न-17. 1857 के विद्रोह के क्या प्रभाव थे ?

उत्तर:-1857 का विद्रोह मुख्यतः उत्तरी और मध्य भारत तक ही सीमित था। वर्षों से भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की विस्तारवादी नीतियों, प्रशासनिक नवाचारों और आर्थिक शोषण के परिणामस्वरूप भारत के लोगों में असंतोष पैदा हुआ। यही असंतोष 1857 के विद्रोह के कारण (Revolt Of 1857 in Hindi) के तौर पर माना जाता है।

1857 की क्रांति के परिणाम भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण थे, और इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहां 1857 की क्रांति के प्रमुख परिणामों का वर्णन है:

  1. ब्रिटिश सरकार का पुनः शासन: 1857 की क्रांति के बाद, ब्रिटिश सरकार ने भारत को प्रायः प्रांतरित कर लिया और भारत के पुनः शासन का दायित्व लिया। इससे भारत का पूर्वाग्रही शासन समाप्त हो गया और इसे ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बना दिया।
  2. सिपाही म्यूटिनी के प्रभाव: 1857 की क्रांति ने सिपाहियों के बीच एकता और आदर्श की भावना को प्रकट किया, जिससे वे स्वतंत्रता संग्राम के लिए जुट गए।
  3. सन्दूक कानून: 1857 की क्रांति के परिणामस्वरूप, ब्रिटिश सरकार ने इंडियन सिपाहियों को संदूकों के बाहर अपनी यौन को धारण करने की अनुमति देने के लिए “सन्दूक कानून” पास किया। इससे भारतीय सिपाहियों के लिए अपमानजनक था और यह उनकी आत्मसमर्पण और आपसी एकता को बढ़ावा दिया।
  4. प्रेस के प्रकाशन का प्रशासनिक नियंत्रण: ब्रिटिश सरकार ने 1857 की क्रांति के बाद भारतीय प्रेस के प्रकाशन को प्रशासनिक नियंत्रण के तहत लाया, जिससे पत्रकारिता और स्वतंत्रता संग्राम की प्रसारण में समस्याएँ उत्पन्न हुईं।
  5. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आरंभिक अवधारणा: 1857 की क्रांति ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आरंभिक अवधारणा को जागृत किया और इसे आगे बढ़ावा दिया। यह था एक महत्वपूर्ण मोड़ जब भारतीय नेता और स्वतंत्रता संग्राम के महान आदर्श बने।
  6. सामाजिक परिवर्तन: क्रांति ने समाजिक और धार्मिक समुदायों के बीच समाजिक समानता की अपील को मजबूत किया और समाज में सुधार की दिशा में प्रेरणा प्रदान की।
  7. स्वतंत्रता संग्राम के आदर्श: 1857 की क्रांति ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए आदर्श प्रस्तुत किए, जो भारतीय नेताओं और स्वतंत्रता सेनाओं के लिए मार्गदर्शक रहे।
  8. धार्मिक परिणाम: क्रांति ने भारतीय समाज में धार्मिक समुदायों के बीच धार्मिक जागरूकता को बढ़ावा दिया और धर्म को स्वतंत्रता संग्राम के हिस्से के रूप में देखा गया।

इन परिणामों के साथ, 1857 की क्रांति ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की मानदंड बनाई और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पूर्व स्थापना की।

प्रश्न-18. भारत-पाक विभाजन के कारणों का वर्णन कीजिए ?

उत्तर:- भारत-पाकिस्तान विभाजन के प्रमुख कारण :

  1. अंग्रेजों की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति भारत के विभाजन के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी अंग्रेज हैं। …
  2. मुस्लिम लीग की भूमिका …
  3. पाकिस्तान की मांग …
  4. कांग्रेस की करण की नीति …
  5. नेताओं में थकावट और पद का मोह …
  6. हिन्दू समाज की संकीर्णता …
  7. तात्कालिक कारण
प्रश्न-19. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका का परीक्षण कीजिए ?

उत्तर:-

प्रश्न-20. अंग्रेजों की शिक्षा नीति का मूल्यांकन कीजिए?

उत्तर:- ब्रिटिश साम्राज्य के शासनकाल में भारत में लागू की गई शिक्षा नीति का मूल्यांकन करते समय, कई प्रशंसानीय और नकारात्मक पहलु हैं:

प्रशंसानीय पहलु:

  1. अंग्रेजी भाषा का प्रसारण: ब्रिटिश शिक्षा नीति ने अंग्रेजी भाषा को भारत में प्रसारित किया और यह भारतीयों को ग्लोबल स्तर पर भी कैरियर के अवसरों के लिए तैयार किया।
  2. मानव विकास: ब्रिटिश शिक्षा नीति ने वैशिष्ट्यवाद और सामाजिक असमानता के खिलाफ लड़ा और मानव विकास को प्रमोट किया।
  3. विज्ञान और प्रौद्योगिकी: ब्रिटिश शिक्षा नीति ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी को प्रमोट किया और भारतीय तथा विश्व के विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में योगदान किया।

नकारात्मक पहलु:

  1. कुलीन शिक्षा: ब्रिटिश शिक्षा नीति में श्रेष्ठ शिक्षा का परिचय केवल अंग्रेजों के लिए किया गया और यह भारतीय समाज के कुलीन श्रेणी के लिए ही उपलब्ध था, जिससे शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय समाज में समाजिक असमानता बढ़ गई।
  2. संस्कृत और भारतीय पारंपरिक शिक्षा का उपेक्षण: ब्रिटिश शिक्षा नीति ने संस्कृत और पारंपरिक भारतीय शिक्षा को अनदेखा किया और इसे तथ्यगत शिक्षा के साथ समाप्त किया।
  3. समुचित शिक्षा के अभाव: शिक्षा प्राप्ति के अधिकार के अभाव में बहुत सारे भारतीयों को अंधकार में रख दिया और उन्होंने अपने पोटेंशियल का उपयोग नहीं कर सके।
  4. कला और साहित्य का प्रतिष्ठान: ब्रिटिश शिक्षा नीति ने कला और साहित्य के प्रति अप्रत्यक्ष रूप से स्वास्थ्यी दृष्टिकोण दिखाया और यह समृद्धि के माध्यम के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका नहीं दी।

संक्षेप में, ब्रिटिश शिक्षा नीति ने भारतीय समाज को नई दिशाओं में अग्रसर किया और सिस्टमिक शिक्षा का आधार रखा, लेकिन इसके साथ ही समाजिक और सांस्कृतिक असमानता को भी बढ़ा दिया।

Section-C

प्रश्न-1. भूराजस्व व्यवस्था की प्रमुख विशेषताऐं बताइए ?

उत्तर:- भूमि राजस्व प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  1. राजस्व की ताक़त का सामाजिक और आर्थिक महत्व: भूमि राजस्व प्रणाली ने भूमि का कर और उससे आय प्राप्त करने का एक माध्यम प्रदान किया, जिससे राजा की ताक़त का सामाजिक और आर्थिक महत्व बढ़ गया।
  2. राजस्व का विधिकरण: राजस्व की प्राप्ति के लिए कृषि उपज की मापदंड और करों की गणना करने के लिए विधिकरण प्रणाली का प्रयोग किया गया। यह विधिकरण भूमि मालिकों को सही करों का भुगतान करने के लिए सहायक था।
  3. सिस्टम की हिरासत और आरक्षण: राजस्व की हिरासत की जाती थी, और राजा के आदिकारी भूमि मालिकों के उत्तराधिकारी रहते थे। इससे भूमि के मालिकों को अपनी ज़मीन के प्रति अधिकार नहीं था, और वे आरक्षित थे।
  4. वेतन और आपराधिक दंड: राजा और उसके आदिकारी अक्सर अधिक राजस्व प्राप्त करने के लिए भ्रष्टाचार करते थे, और इस प्रणाली के तहत वेतन और आपराधिक दंड भी आपक्रिया में थे।
  5. राजस्व का उपयोग: राजस्व को राजा और सरकारी कार्यों के लिए उपयोग किया जाता था, जैसे कि सम्राट के दरबार, सैन्य, और अन्य सरकारी आवश्यकताओं के लिए।

यह भूमि राजस्व प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ थीं, जो भारत में विभिन्न राज्यों और प्रांतों में अलग-अलग रूपों में प्रयोग होती थी।

(जिस भी प्रश्न का उत्तर देखना हैं उस पर क्लिक करे)

प्रश्न-2. 18 वीं शताब्दी के मध्य भारत की राजनीति स्थिति की विवेचना कीजिए ?

उत्तर:-18वीं शताब्दी के मध्य में भारत में कई ऐतिहासिक शक्तियाँ गतिशील थी। उन शक्तियों में मध्य हुए संघर्षों ने देश को नई दिशा की ओर उन्मुख किया। कुछ इतिहासकार भारत में ब्रिटिश काल की शुरुआत वर्ष 1740 से मानते हैं जब भारत में सर्वोच्चता के लिये आंग्ल-फ्राँसीसी संघर्ष की शुरुआत हुई। 1707 ई० में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुगल साम्राज्य का पतन आरंभ हो गया। 1739 ई० एवं 1747 ई० में क्रमश: नादिरशाह 811 18वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के एवं अहमद शाह अब्दाली के आक्रमणों ने पतन के बाद स्वतंत्र हुए राज्य मुगलों की केंद्रीय सत्ता को कमजोर कर दिया।

18वीं शताब्दी के मध्य में भारत की राजनीति स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण थी और यह एक अत्यंत परिवर्तनात्मक दशक था, जिसमें विभिन्न राजा, साम्राज्य, और ब्रिटिश प्राधिकृत्य के बीच संघर्ष और सम्प्रेरणास्पद घटनाएं घटीं:

  1. मुघल साम्राज्य का अस्तित्व: 18वीं शताब्दी के मध्य में मुघल साम्राज्य अपने शानदारकाल के बाद अस्तित्व में कमजोर हो गया था। इसके कारण भारत के विभिन्न हिस्सों में छिपे अलग-अलग शासक और राज्यों ने अपने आपको स्वतंत्र घोषित किया और उनका स्वतंत्र राज्य बनाया।
  2. अंग्रेजों का आगमन: 18वीं शताब्दी के मध्य में, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीनस्थ स्थानांतरण के कारण, ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत में अपने प्रतिष्ठान को बढ़ाया और अपनी आक्रमणकारी नीतियों को अधिक सख्त बनाया।
  3. स्वतंत्र राज्यों का उत्थान: 18वीं शताब्दी में भारत के विभिन्न हिस्सों में स्वतंत्र राज्यों का उत्थान हुआ, जैसे कि मराठा साम्राज्य, सिख साम्राज्य, हैदर अली के निजी सत्राप, और अन्य स्थानीय राज्य।
  4. अर्थव्यवस्था और सामाजिक परिवर्तन: 18वीं शताब्दी में भारत की अर्थव्यवस्था में परिवर्तन आया, जिसमें कृषि, व्यापार, और उद्योग के क्षेत्र में नए नैतिक और आर्थिक दृष्टिकोण देखने को मिले। साथ ही, भारतीय समाज में सामाजिक परिवर्तन भी हुआ, जैसे कि कास्ट सिस्टम के प्रति सवाल उठना।

18वीं शताब्दी के मध्य में भारत की राजनीति स्थिति चुनौतीपूर्ण थी और यह दशक भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य के साथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की ओर एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया।

प्रश्न-3. भारत में राष्ट्रवाद के उदय एवं विकास के कारणों की व्याख्या कीजिए ?

उत्तर:-भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारण और परिणाम– भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के लिए जिम्मेदार कारक

  • ब्रिटिश शासन के तहत राजनीतिक रूप से एकजुट लोग
  • पश्चिमी (अंग्रेजी) शिक्षा का प्रभाव
  • भारत का गौरवशाली अतीत
  • सामाजिक-धार्मिक सुधार के लिए आंदोलन
  • वर्नाक्यूलर लिटरेचर का विकास
  • प्रेस की भूमिका
  • स्वतंत्रता की स्मृति का पहला युद्ध
प्रश्न-4. भारत छोड़ो आन्दोलन का विस्तृत वर्णन कीजिए ?

उत्तर:-भारत छोड़ो आन्दोलन, द्वितीय विश्वयुद्ध के समय 8 अगस्त 1942 को आरम्भ किया गया था। यह एक आन्दोलन था जिसका लक्ष्य भारत से ब्रिटिश साम्राज्य को समाप्त करना था। यह आंदोलन महात्मा गांधी द्वारा अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के मुम्बई अधिवेशन में शुरू किया गया था। प्रमुख कारण अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने 1942 में भारत से ब्रिटिश शासन को वापस लेने की माँग करते हुए एक बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू किया। भारत छोड़ो आंदोलन का तात्कालिक कारण क्रिप्स मिशन की विफलता थी। भारत छोड़ो प्रस्ताव का प्रारूप जवाहरलाल नेहरू ने तैयार किया था।

प्रश्न-5. भारत पर ब्रिटीश शासन के आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण कीजिए ?

उत्तर:- ब्रिटिश शासन के भारत पर आर्थिक प्रभाव का मूल्यांकन करते समय, कई मुख्य पहलु हैं:

  1. आर्थिक लुढ़कावट: ब्रिटिश शासन के दौरान, भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रमुख पहलु था कि यह ब्रिटिश आर्थिक हित के लिए उपयोग किया गया। उन्होंने भारतीय वस्त्र उद्योग, गाँव कृषि उत्पादन, और अन्य क्षेत्रों में अपने लाभ के लिए संशोधन किए और उन्हें ब्रिटिश शासन के लिए स्रोत बनाया।
  2. कृषि क्षेत्र की अधिक आर्थिक ढाल: ब्रिटिश शासन के तहत, कृषि क्षेत्र को अधिक आर्थिक ढाल में रखा गया। व्यापारी उत्पादन की प्रोत्साहना के लिए कई कृषि व्यवसायों की शुरुआत की गई, जिससे उत्पादन और विपणन में सुधार हुआ।
  3. रेलवे और संचालनिक आर्थिक इंफ्रास्ट्रक्चर: ब्रिटिश शासन ने भारत में रेलवे और अन्य संचालनिक आर्थिक इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया, जिससे वस्तुओं के परिवहन में सुधार हुआ और देश के विभिन्न हिस्सों में व्यापार की वृद्धि हुई।
  4. आर्थिक असमानता: ब्रिटिश शासन के दौरान, आर्थिक असमानता बढ़ी, क्योंकि व्यापार और औद्योगिकी में अधिक लाभ कमाने वाले व्यक्तियों और क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई, जबकि गरीब किसानों और श्रमिकों की स्थिति कमजोर हुई।
  5. सामाजिक परिवर्तन: ब्रिटिश शासन के तहत भारतीय समाज में सामाजिक परिवर्तन हुआ, और नए शिक्षा और आर्थिक अवसरों के साथ अधिक लोग नौकरी करने और पढ़ाई करने लगे।
  6. विपणन संवाद: ब्रिटिश शासन के तहत भारत के साथ विदेशी विपणन का संवाद बढ़ा, जिससे भारतीय वस्त्र, मिश्रित औद्योगिक उत्पाद, और अन्य आर्थिक संसाधनों की विदेशी मार्केट में पहुँच की गई।
  7. आर्थिक संकट: ब्रिटिश शासन के दौरान, कई महत्वपूर्ण आर्थिक संकट हुए, जैसे कि बारूदी विपणन में नोटबंदी और विश्वयुद्धों का प्रभाव।

समग्र रूप में, ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था पर मिश्रित प्रभाव हुए, जिसमें व्यापारिक और औद्योगिक विकास के साथ-साथ आर्थिक असमानता भी बढ़ी। इसके द्वारा भारतीय समाज में सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक परिवर्तन हुए, जो स्वतंत्रता संग्राम के बाद भारत के नए रूप का निर्माण किया।

प्रश्न-6. सामाजिक एवं धर्म सुधार आंदोलन की विवेचना कीजिए ?

उत्तर:-

प्रश्न-7. भारत में संवैधानिक विकास की विवेचना कीजिए ?

उत्तर:-भारत शासन अधिनियम, 1919 (भारत का संवैधानिक विकास) इस अधिनियम के अंतर्गत एक वैधानिक आयोग का गठन किया गया। इस आयोग का कार्य दस वर्ष जांच करने के पश्चात् अपनी रिपोर्ट सौंपना था। संप्रदायिक आधार पर पृथक निर्वाचन को विस्तारित करके, इसमें ईसाईयों, आंग्ल-भारतीयों और यूरोपियों को भी शामिल कर लिया गया।

प्रश्न-8. टिप्पणी कीजिए –
(अ) 1857 ई. की क्रांति

उत्तर:-वर्ष 1857 में वह ऐतिहासिक दिन 10 मई ही था, जब देश की आजादी के लिए पहली चिंगारी मेरठ से भड़की थी। अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की नींव साल 1857 में सबसे पहले मेरठ के सदर बाजार में भड़की, जो पूरे देश में फैल गई थी। यह मेरठ के साथ-साथ पूरे देश के लिए गौरव की बात है। 1857 का विद्रोह, जिसे भारतीय विद्रोह या भारतीय स्वतंत्रता के प्रथम युद्ध के रूप में भी जाना जाता है, भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी। यह 10 मई, 1857 को मेरठ शहर में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाहियों (भारतीय सैनिकों) के विद्रोह के रूप में शुरू हुआ और जल्द ही भारत के अन्य हिस्सों में फैल गया

(ब) असहयोग आन्दोलन

उत्तर:-

(स) भारत छोड़ो आन्दोलन

उत्तर:-

(द) सविनय अवज्ञा आन्दोलन

उत्तर:-

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