VMOU Paper with answer ; VMOU HI-06 Paper BA Final Year , vmou History important question

VMOU HI-06 Paper BA final Year ; vmou exam paper 2023

vmou exam paper

नमस्कार दोस्तों इस पोस्ट में VMOU BA Final Year के लिए इतिहास ( HI-06 , History of Modern World (1453 – 1950 A.D.) का पेपर उत्तर सहित दे रखा हैं जो जो महत्वपूर्ण प्रश्न हैं जो परीक्षा में आएंगे उन सभी को शामिल किया गया है आगे इसमे पेपर के खंड वाइज़ प्रश्न दे रखे हैं जिस भी प्रश्नों का उत्तर देखना हैं उस पर Click करे –

Section-A

प्रश्न-1. मोनालिसा क्या है ?

उत्तर:-मोनालिसा विश्‍व प्रसिद्ध इटली के महान कलाकार लियनार्डो दि विंची की वह अमर कलाकृति है जिसे विंची ने सन् 1503 से 1506 के मध्य पेंट किया इस चित्र को बनाने में लियनार्डो को चार वर्ष लगे, यद्यपि इसी दौरान उन्होंने सेंट पॉल बपतिस्त तथा वर्जिन एण्ड चाईल्ड विद सेंट आंद्रे नामक दो अन्य कलाकृतियाँ भी बनाई।

मोनालिसा का चित्रण एक महिला के चेहरे को दिखाता है, जिसमें वह खिलखिलाती हुई मुस्कान के साथ दिखाई देती हैं। यह चित्र विशेषकर उसके आँखों के मुलायम दृश्य और पिछवाड़े के पीछे सुरंगी दृश्य के लिए प्रसिद्ध है।

मोनालिसा चित्र का नाम इसकी प्रमुख पात्रिका के नाम से है, और यह चित्रकला का अद्वितीय कृति में एक उदाहरण है, जिसमें लिओनार्दो दा विंची ने रंग, आलोकन, और अंगुली के स्पर्श के साथ मानव चेहरे की महक को अद्वितीय रूप से प्रस्तुत किया। इस चित्र का विशेष स्थान चित्रकला और साहित्य में है, और यह एक अनमोल कला के रूप में माना जाता है।

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प्रश्न-2. प्रथम विश्व युद्ध के कारण क्या है ?

उत्तर:-

प्रश्न-3. वाणिज्यवाद को परिभाषित कीजिए ?

उत्तर:-वाणिज्यवाद (Mercantilism) 16वीं से 17वीं सदी में यूरोप में प्रचलित एक आर्थिक सिद्धान्त तथा व्यवहार का नाम है जिसके अन्तर्गत राज्य की शक्ति बढ़ाने के उद्देश्य से राष्ट्र की अर्थव्यवस्थाओं का सरकारों द्वारा नियंत्रण को प्रोत्साहन मिला। दूसरे शब्दों में वाणिज्यवाद एक आर्थिक प्रणाली है जिसमें व्यक्तिगत मालिकी, मुफ्त बाजार, उत्पादक और उपभोक्ता के स्वतंत्र अधिकार, और लाभ की मुख्य प्राथमिकता होती है। यह व्यवसाय, निवेश, और अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करता है।

प्रश्न-4. यूरोप के दो विचारकों के नाम लिखिए ?

उत्तर:- यूरोप के दो महान दार्शनिकों के नाम निम्नलिखित हैं:-मांटेस्क्यू ( 1689-1755 ), लॉक (1632-1704), वॉल्टेयर (1694-1778) तथा रूसो (1712-1778)

  1. इमानुएल कांट (Immanuel Kant) – जर्मन दार्शनिक जिन्होंने कृतिक दर्शन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किया और ‘प्राकृतिक न्याय’ के तर्कों के साथ मानव ज्ञान, नैतिकता, और दार्शनिक चिंतन के क्षेत्र में गहरी विचारधारा विकसित की.
  2. जॉन लॉक (John Locke) – एक इंग्लिश दार्शनिक और राजनीतिक विचारक, जिन्होंने ‘मानव अधिकार’ के सिद्धांत का प्रमुख रूप से विकसित किया और लोगों के स्वतंत्रता और समानता के महत्व को उजागर किया.

ये दो दार्शनिक यूरोप के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं और उनके विचारधाराएँ आज भी दुनिया भर में प्रभावशाली हैं.

प्रश्न-5. फ्रांसीसी क्रांति के नारों को लिखिए ?

उत्तर:-स्वतंत्रता, समानता एवं बन्धुत्व

प्रश्न-6. वॉटर फ्रेम का आविष्कारक कौन था ?

उत्तर:-रिचर्ड आर्कराइट, आविष्कार 1769 में किया था

प्रश्न-7. किस वर्ष में नानकिंग की संधि हस्ताक्षरित की गई थी ?

उत्तर:-वर्ष 1842 में चीन ने ‘प्रथम अफीम युद्ध’ के शंति समझौते के अंतर्गत ‘नानकिंग संधि’ (Treaty of Nanking) के तहत हॉन्गकॉन्ग को ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया था।

प्रश्न-8. कार्बोनारी का उद्देश्य क्या था ?

उत्तर:-कार्बोनारी का उद्देश्य इतालवी पालीकी और आजादी से संबंधित था। कार्बोनारी एक सदस्यता-आधारित गुप्त समाज था, जिसका मुख्य उद्देश्य इटाली को 19वीं सदी में बाहरी शासन से मुक्त कराना था। इसके सदस्य गुप्तचरों की तरह बर्खास्त शासकों के खिलाफ साजिश करते थे और इटाली के एकीकरण के पक्ष में काम करते थे। कार्बोनारी का संगठन प्राचीन रोम से लिया गया था और इसका उद्देश्य इटाली की आजादी और एकीकरण का समर्थन करना था।

प्रश्न-9. फैक्ट्री व्यवस्था क्या है ?

उत्तर:-कारखाना पद्धति या फैक्टरी पद्धति ( factory system) विनिर्माण की वह विधि है जो मशीनों के उपयोग एवं श्रम विभाजन पर आधारित है। चूंकि कारखाना के भवन के निर्माण एवं मशीनों की खरीद के लिए बहुत अधिक पूँजी लगती है, इसलिए अधिक धनी लोग ही कारखाना बैठा पाते थे। ये लोग कार्य करने के लिए लोगों को वेतन/मजदूरी पर रखते थे। फैक्ट्री प्रणाली या ‘फैक्ट्री सिस्टम’ एक उद्योगिकरण प्रणाली है जिसका उपयोग उत्पादन प्रक्रिया को मैकेनिकल उपकरणों और औद्योगिक सुविधाओं का प्रयोग करके किया जाता है, ताकि उत्पादन को वृद्धि दिलाने और उत्पादकता में सुधार किया जा सके।

प्रश्न-10. नाजी दल का संस्थापक कौन था ?

उत्तर:-नाजी पार्टी (Nazi Party) के संस्थापक और प्रमुख थे आडॉल्फ हिटलर (Adolf Hitler). हिटलर ने 1920 में जर्मनी में नाजी पार्टी की स्थापना की ।

प्रश्न-11. ‘स्पिरिट ऑफ लॉज़’ किसने लिखी थी ?

उत्तर:-‘द स्पिरिट ऑफ द लॉज़’ 1748 में मॉन्टेसक्यू द्वारा लिखा गया था। पुस्तक में सरकार के भीतर विधायी, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता का विभाजन प्रस्तावित है।

प्रश्न-12. किसने कहा था, “बिना खून बहाए, कोई जीवन नहीं” ?

उत्तर:-

प्रश्न-13. रोम-बर्लिन – टोकियो धुरी के निर्माण में कौनसे देश शामिल थे ?

उत्तर:-इटली, जर्मनी और जापान, रोम-बर्लिन-टोक्यो धुरी 1936 में इटली, जर्मनी और जापान के बीच बना एक सैन्य गठबंधन था, जिसे धुरी शक्तियों (एक्सिस पॉवर्स) के रूप में भी जाना जाता है।

प्रश्न-14. संयुक्त राष्ट्र संघ कब अस्तित्व में आया ?

उत्तर:-24 अक्टूबर, 1945 को

प्रश्न-15. यू.एन.ओ. को चलाने के लिए कौनसा देश सर्वाधिक आर्थिक सहायता देता है ?

उत्तर:-संयुक्त राष्ट्र के प्रत्येक सदस्य को संगठन के बजट में योगदान देना आवश्यक है। संयुक्त राज्य अमेरिका इसका सबसे बड़ा दानदाता है। अनिवार्य योगदान प्रशासनिक लागत और शांति स्थापना कार्यों को निधि देता है। कई सदस्य देश संयुक्त राष्ट्र के विशिष्ट कार्यक्रमों में स्वैच्छिक योगदान भी देते हैं।

प्रश्न-16. साम्राज्यवाद के उदय के दो कारण बताइए ?

उत्तर:-

  • औद्योगिक कारण– यूरोपीय देशों में औद्योगिक क्रांति होने का कारण उत्पादन में तीव्र वृद्धि तथा कच्चे माल की आवश्यकता थी। …
  • उग्र राष्ट्रवाद- 19वीं सदी में यूरोप उग्र राष्ट्रवाद की भावना अपनी चरम सीमा पर थी, जिसके परिणाम स्वरूप यूरोपीय देशों ने दूसरे देशों पर अधिकार करना अपना कर्तव्य समझा।
प्रश्न-17. बर्लिन की संधि पर कब हस्ताक्षर किये गये ?

उत्तर:-13 जून, 1878 से 13 जुलाई, 1878 तक जर्मनी की राजधानी बर्लिन में वहाँ के चांसलर बिस्मार्क की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ

प्रश्न-18. सर्वेन्टीज’ कौन था ?

उत्तर:-सर्वेन्टीज स्पेन का महान लेखक था इनकी कृति ‘डान क्विक्जोट’ है। कैमोस पुर्तगाली साहित्यकार था इनकी कृति ल्यूसिचार्ड है।

प्रश्न-19. रोम-बर्लिन – टोकियो धुरी का निर्माण कब हुआ था ?

उत्तर:-1936 में , रोम-बर्लिन-टोक्यो धुरी 1936 में इटली, जर्मनी और जापान के बीच बना एक सैन्य गठबंधन था ।

प्रश्न-20.कोलंबस कौन था ?

उत्तर:- क्रिस्टोफर कोलंबस (Christopher Columbus) एक महत्वपूर्ण इतिहासी व्यक्ति थे जो 15वीं और 16वीं सदी के दौरान जन्में और क्रिस्टोफर कोलंबस के नाम से मशहूर हुए। वे एक प्रमुख इतालवी खोजकर्ता और समुद्री यातायाती थे जिन्होंने स्पेन के सम्राट फर्नांडो और इसाबेला के समर्थन में 1492 में नई दुनिया की खोज की।

कोलंबस की प्रमुख यात्रा उनकी पहली यात्रा थी, जिसमें वे स्पेन से निकलकर पश्चिमी समुद्र में गए और कारिबियन द्वीप समूह के तट पर पहुँचे। इससे वे पहले यूरोपीय हैं जिन्होंने न्यू वर्ल्ड का (अमेरिका) खोज किया।

कोलंबस के खोज का परिणामस्वरूप नए संसार की खोज से हिस्ट्री में महत्वपूर्ण बदलाव हुआ और इसने एक नई युग की शुरुआत की। उनके खोज के बाद, यूरोपीय देश न्यू वर्ल्ड का अन्वेषण करने और उसका कब्ज़ा करने की प्रक्रिया में शामिल हुए, जिससे उन्होंने ऐतिहासिक अद्वितीय रूप से दुनिया के भूगोल और सामाजिक संरचना को प्रभावित किया।

प्रश्न-21.पुनर्जागरण को परिभाषित कीजिए ?

उत्तर:-पुनर्जागरण (Renaissance in Europe) का शाब्दिक अर्थ होता है, “फिर से जागना”। 14वीं और 17वीं सदी के बीच यूरोप में जो सांस्कृतिक व धार्मिक प्रगति, आंदोलन तथा युद्ध हुए उन्हें ही पुनर्जागरण कहा जाता है। इसके फलस्वरूप जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नवीन चेतना आई

प्रश्न-22.कब और कहाँ एडोल्फ हिटलर का जन्म हुआ था ?

उत्तर:-एडॉल्फ हिटलर (1889–1945) का जन्म 20 अप्रैल, 1889 में ऊपरी ऑस्ट्रियाई सीमावर्ती शहर ब्रौनौ एम इन में हुआ था।

प्रश्न-23. विलाका संधि पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए ?

उत्तर:-विलाफ्रांका संधि (Treaty of Villafranca) एक महत्वपूर्ण इतिहासी घटना थी, जो 1859 में इटली और ऑस्ट्रिया के बीच हुई थी। यह संधि इटली के एकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण घटना थी और इटली के स्वतंत्रता संग्राम के प्रारंभ की ओर एक महत्वपूर्ण कदम था।

संधि का मुख्य अंश यह था कि आउस्ट्रियाई सम्राट फ्रांस के साथ सुलझ गए और वे लॉम्बार्डी को छोड़कर वापस लौटे। इसके परिणामस्वरूप लॉम्बार्डी इटली के एक हिस्से के रूप में शामिल हो गया और इटली में एकीकरण की प्रक्रिया तेजी से बढ़ी।

विलाफ्रांका संधि ने इटली के एकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण पड़वे खोली और इसे स्वतंत्रता संग्राम की ओर एक महत्वपूर्ण कदम बनाया। इससे पूरे इटली के एकीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई और आगे जाकर 1861 में इटली का गठन हुआ।

प्रश्न-24. मार्टिन लूथर के बारे में आप क्या जानते हैं ?

उत्तर:-मार्टिन लूथर (Martin Luther) इसाई धर्म में प्रोटेस्टवाद नामक सुधारात्मक आन्दोलन चलाने के लिये विख्यात हैं। वे जर्मन भिक्षु, धर्मशास्त्री, विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, पादरी एवं चर्च-सुधारक थे जिनके विचारों के द्वारा प्रोटेस्टिज्म सुधारान्दोलन आरम्भ हुआ जिसने पश्चिमी यूरोप के विकास की दिशा बदल दी।उन्हें रोमन कैथोलिक चर्च में होने वाली बुराइयों का विरोधी माना जाता है। उन्होंने धर्मशास्त्र में डॉक्टरेट की मानद उपाधि पूरी की। मार्टिन लूथर धार्मिक बुराइयों को दूर करने के अलावा एक शिक्षक, चर्च सुधारक और पादरी के रूप में भी जाने जाते हैं।

प्रश्न-25. ‘राफेल’ कौन था ?

उत्तर:-

Section-B

प्रश्न-1. औद्योगिक क्रांति पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए ?

उत्तर:-औद्योगिक क्रांति से विश्व भर में नए व आधुनिक कारखानों का उदय हुआ जिसके कारण बड़े पैमाने पर छोटे उद्योग कारखानों का नाश हो गया। इसके कारण लाखों कारीगरों की आय पर बुरा प्रभाव पड़ा। औद्योगिक क्रांति के कारण मानव समाज में नई राजनीतिक विचारधारा का जन्म हुआ जिसकी नीतियों ने व्यक्तिगत अधिकार पर रोक लगाई।

औद्योगिक क्रांति या औद्योगिक युग नामक यह काल, मानव इतिहास के एक महत्वपूर्ण चरण को प्रतिपादित करता है, जिसमें औद्योगिकीकरण, उद्योग, और तकनीकी विकास का उदय हुआ। इस क्रांति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:-

  1. उद्योगीकरण का आगमन: 18वीं और 19वीं सदी में यूरोप में औद्योगिकीकरण का प्रारंभ हुआ, जिसमें हाथ से बनाई जाने वाली चीजों की जगह मशीनों का प्रयोग होने लगा।
  2. उद्योगों का विकास: उद्योगों का विकास हुआ, जिससे वस्त्र, मशीनरी, और अन्य उत्पादों का निर्माण महसूसी रूप से बढ़ा।
  3. तकनीकी और वैज्ञानिक प्रगति: इस युग में तकनीकी और वैज्ञानिक अविष्कारों का उदय हुआ, जैसे कि बिजली, उच्च दाब, रेलवे, और टेलीग्राफ।
  4. औद्योगिक वाणिज्य: औद्योगिक क्रांति ने वाणिज्यिक प्रणालियों का विकास किया और व्यापार को ग्लोबल रूप से बढ़ावा दिया।
  5. सामाजिक प्रभाव: इस क्रांति ने समाज में बड़े परिवर्तन किए, जैसे कि श्रमिकों के अधिकारों की मांग, नगरों का बढ़ता प्रमुखता, और नारी सशक्तिकरण।

औद्योगिक क्रांति ने आर्थिक, सामाजिक, और तकनीकी दृष्टि से दुनिया को परिवर्तित किया और मॉडर्न युग की नींव रखी। यह समय विज्ञान, औद्योगिक विकास, और सामाजिक प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण परिवर्तनों का आदान-प्रदान किया, जिनका असर आज भी महसूस किया जा सकता है।

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प्रश्न-2. फ्रांसीसी क्रांति के नारों को विस्तार से बताए ?

उत्तर:- फ्रांसीसी क्रांति के दौरान नारे (slogans) “स्वतंत्रता, समानता, और बन्धुत्व” (Liberte, eqalite, Fraternite) के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए थे। ये नारे इस क्रांति के मूल मूद्दों और उद्देश्यों को प्रकट करते थे:

  1. स्वतंत्रता (Liberte): इस नारे के माध्यम से, लोग स्वतंत्रता की मांग करते थे, जिसका मतलब था कि वे राजा और अदालत की अत्यधिक नियंत्रण से मुक्त होना चाहते थे। यह नारा बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि फ्रांस के राजा और शासकों का अत्यधिक शासन और सामाजिक न्याय के प्रति विरोध का प्रतीक था।
  2. समानता (eqalite): यह नारा समाज में सभी वर्गों के लोगों के बीच समानता की मांग करता था। लोग जातिवाद और वर्गवाद के खिलाफ थे और इस नारे के माध्यम से वे यह स्पष्ट करते थे कि समाज में सभी को बराबरी और न्याय की आवश्यकता है।
  3. बन्धुत्व (Fraternite): इस नारे से बन्धुत्व और एकता की मांग की जाती थी। यह नारा लोगों को यह याद दिलाता था कि वे एक-दूसरे के साथ एक परिवार के रूप में जुड़े हैं और साथ में आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

इन नारों का प्रयोग क्रांति के दौरान लोगों के आरामपूर्ण जीवन, समाज, और शासन में सुधार के लिए हुआ और फ्रांसीसी क्रांति के प्रमुख उद्देश्यों को प्रकट किया। इन नारों का प्रभाव आज भी फ्रांस के राष्ट्रीय मोटो के रूप में दिखाई देता है और यह सामाजिक और राजनीतिक सुधार की महत्वपूर्ण प्रतीक है।

प्रश्न-3. पुनर्जागरण के कारण बताइए ?

उत्तर:-व्यापार तथा नगरों का विकास :- पुनर्जागरण का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण वाणिज्य-व्यापार का विकास था. नए-नए देशों के साथ लोगों का व्यापारिक सम्बन्ध कायम हुआ और उन्हें वहाँ की सभ्यता-संस्कृति को जानने का अवसर मिला. व्यापार के विकास ने एक नए व्यापारी वर्ग को जन्म दिया. व्यापारी वर्ग का कटु आलोचक और कट्टर विरोधी था

पुनर्जागरण के कारण

  • धर्म युद्ध (क्रसेड)
  • व्यापारिक समृद्धि
  • धनी-मध्यम वर्ग का उदय
  • अरब एवं मंगोल की भूमिका
  • स्कालिस्टिक विचारधारा
  • कागज एवं छापाखाना
  • कुस्तुनतुनिया पर तुर्की का अधिकार
  • मंगोल साम्राज्य का उदय
प्रश्न-4. फ्रांसिसी क्रांति के महत्व को बताइए ?

उत्तर:-फ्रांस तथा यूरोप के इतिहास में 1848 की क्रांति का अत्यधिक महत्व है। इसने जनता के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन में परिवर्तन लाने का प्रयास किया। 1848 की क्रांति में सामाजिक एवं आर्थिक समानता पर विशेष जोर दिया और मजदूरों तथा कारीगरों को अधिकाधिक सुविधाएं देने का प्रयत्न किया।

फ्रांसीसी क्रांति, 1789 से 1799 तक फ्रांस में हुआ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना था, जिसका महत्व विशेष रूप से इस तरीके से है:

  1. सामाजिक और राजनीतिक सुधार: यह क्रांति समाज में न्याय, समानता, और स्वतंत्रता के आदान-प्रदान को अपनाने का प्रयास करती है। इसके परिणामस्वरूप फ्रांस में भूमिका आधारित समाज से अलग-अलग वर्गों की समान सामाजिक और राजनीतिक अधिकार और स्वतंत्रता की मांग उत्पन्न हुई।
  2. डेमोक्रेसी के उदय: फ्रांसीसी क्रांति ने लोकतंत्र के महत्व को प्रमोट किया और लोगों के प्रति सरकार की जिम्मेदारियों को अधिक जानकार और जवाबदेह बनाया।
  3. राष्ट्रवाद की शुरुआत: इस क्रांति ने राष्ट्रवाद का आदान-प्रदान किया और फ्रांसीसी जाति को एक राष्ट्र के रूप में एकाधिकृत किया।
  4. यूरोपीय साम्राज्यवाद का खत्म: इस क्रांति का प्रभाव सिर्फ फ्रांस तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि यूरोप के अन्य हिस्सों में भी प्रभावित हुआ और यूरोप में साम्राज्यवाद की अस्तित्व को खत्म करने का मार्ग प्रशस्त किया।
  5. मानवाधिकारों की प्रमोट: इसके परिणामस्वरूप मानवाधिकारों के प्रमोटन का मार्ग बना और यह आधिकारिक दस्तावेज़ मानवाधिकारों की घोषणा को प्रारम्भ करने में मदद करता है।
  6. आधुनिक यूरोप की नींव: फ्रांसीसी क्रांति ने आधुनिक यूरोप की नींव रखी और समाज, राजनीति, और व्यापार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए।
प्रश्न-5. जर्मनी के एकीकरण की विभिन्न अवस्थाएँ क्या थी ?

उत्तर:- जर्मनी के एकीकरण का सफर एक लंबा और संघर्षपूर्ण था, और इसमें कई अवस्थाएं शामिल थीं जर्मनी के एकीकरण के विभिन्न चरण निम्नलिखित थे-

  1. प्राचीन जर्मन इम्पायर्स: पहली जर्मन राजा के सुदूर आदिवासी समूहों के प्राचीन इम्पायर्स का जिक्र होता है, जैसे कि कारोलिंगियन और ओट्टोमैन इम्पायर्स।
  2. नापोलियनिक युग: 19वीं सदी के प्रारंभ में नापोलियन के साम्राज्य के आगमन के साथ, जर्मन क्षेत्रों में पूर्वी और पश्चिमी जर्मन भाषा वाले क्षेत्रों का एक साथ आगमन हुआ।
  3. वियना कांग्रेस: 1815 में वियना कांग्रेस के आदान-प्रदान में, जर्मन राज्यों को पुनः संगठित किया गया और जर्मन संघ की नींव रखी गई।
  4. बिस्मार्क के प्रयास: ओट्टो वॉन बिस्मार्क के नेतृत्व में, 19वीं सदी के बीच, प्रस्तावित जर्मन एकीकरण के लिए लुद्विग विल्हेम के साथ विश्व युद्ध के जरिए कई स्थानों को जीत लिया और जर्मन साम्राज्य की नींव रखी।
  5. जर्मन एकीकरण (1871): जर्मन एकीकरण 1871 में हुआ, जब प्रुस्शिया के विजय के बाद विल्हेल्म पहले को जर्मनी के कैसर बनाया गया और एक एकीकृत जर्मन साम्राज्य की स्थापना हुई।

इस प्रकार, जर्मनी के एकीकरण की अवस्थाएँ इन घटनाओं के माध्यम से हुईं, और यह एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करके एक प्रमुख यूरोपीय राष्ट्र बन गया।

सीडान के युद्ध के बाद दक्षिण जर्मनी के चार राज्यों – बवेरिया, बादेन, बुटर्मवर्ग और हेंस को जर्मन संघ में शामिल कर उसे जर्मनी (जर्मन साम्राज्य) एक नया नाम दिया गया। प्रशा का राजा जर्मनी का भी शासक घोषित किया गया। इस प्रकार जर्मनी का एकीकरण पूर्ण हुआ।

प्रश्न-6. जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क के योगदान का विश्लेषण कीजिए ?

उत्तर:-बिस्मार्क 1862 में प्रशा का चान्सलर बना और अपनी कूटनीति, सूझबूझ रक्त एवं लौह की नीति के द्वारा जर्मनी का एकीकरण पूर्ण किया। 1871 ई. में एकीकरण के बाद बिस्मार्क ने घोषणा की कि जर्मनी एक सन्तुष्ट राष्ट्र है और वह उपनिवेशवादी प्रसार में कोई रूचि नहीं रखता। ओटो वॉन बिस्मार्क: ये प्रसिया के मुख्य मंत्री थे जिन्होंने जर्मनी के एकीकरण की बुनियाद रखी थी। इस काम में बिस्मार्क ने प्रसिया की सेना और प्रशासन तंत्र का सहारा लिया था। सात सालों में तीन युद्ध हुए ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और फ्रांस के खिलाफ| प्रसिया की जीत के साथ युद्ध समाप्त हुए और इस तरह से जर्मनी एकीकरण का काम पूरा हुआ।

जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क का योगदान का विश्लेषण-

ओट्टो वॉन बिस्मार्क, जर्मन एकीकरण के महान कदमों में से एक के रूप में माने जाते हैं। उनका योगदान 19वीं सदी के मध्य में जर्मनी को एक एकीकृत राष्ट्र के रूप में जन्म दिलाने में महत्वपूर्ण था।

  1. जर्मन एकीकरण के लिए दिप्लोमेसी: बिस्मार्क ने एक चतुर और कुशल दिप्लोमेट के रूप में अपनी पूरी दिप्लोमेसीक क्षमता का प्रदर्शन किया। वे वर्साय समझौता (1871) के माध्यम से जर्मन एकीकरण की प्रक्रिया को शांति से पूरा किया और उसे एक विजयी देश के रूप में पूर्ण किया।
  2. प्रुस्सिया का नेतृत्व: बिस्मार्क ने प्रुस्सिया का नेतृत्व किया और उन्होंने उसे अंग्रेजी-फ्रांसीसी युद्धों (1864, 1866) के माध्यम से जर्मन राज्यों का साथ जोड़कर जर्मन एकीकरण की दिशा में कदम बढ़ाया।
  3. ऑटोक्रेटिक बिस्मार्क: बिस्मार्क अपने ऑटोक्रेटिक (स्वायत्त) शैली के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने जर्मन एकीकरण के दिशा-निर्देशन को एक दृढ़ और सुदृढ़ नेतृत्व के साथ प्रदर्शित किया और उनके आदर्शों का पालन किया।
  4. बिस्मार्क के उपाय: उन्होंने राजनीतिक उपायों का उपयोग किया, जैसे कि धैर्य, जुगाड़, और विवेकपूर्ण विकल्प, जो उन्हें जर्मनी के एकीकरण के लिए सही समय पर सही निर्णय लेने में मदद करते थे।

ओट्टो वॉन बिस्मार्क के योगदान के परिणामस्वरूप, जर्मन राज्य एक एकीकृत और शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरा और 1871 में जर्मन राज्य का गठन हुआ। उनकी दृढ़ और निर्णायक नेतृत्व की वजह से वे “जर्मन राज्य के चांसलर” के रूप में अमर रहे हैं और उनका योगदान जर्मन इतिहास में अद्वितीय है।

प्रश्न-7. राष्ट्रसंघ की असफलता के प्रमुख कारण क्या थे ?

उत्तर:- राष्ट्र संघ की असफलता के कारण

  1. (1) संविधान की दुर्बलता –
  2. (2) संरचना की दुर्बलता –
  3. (3) अमेरिका का असहयोग –
  4. (4) वर्साय सन्धि की उपज –
  5. (5) सदस्य राष्ट्रों की स्वार्थपरता-
  6. (6) निःशस्त्रीकरण की विफलता –
  7. (7) अधिनायकवाद का उदय –
  8. (8) विश्वव्यापी आर्थिक संकट
प्रश्न-8. बर्लिन कॉंग्रेस पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए ?

उत्तर:-बर्लिन कांग्रेस (13 जून – 13 जुलाई 1878) बर्लिन में सम्पन्न एक सम्मेलन था जिसमें उस समय की महाशक्तियाँ (रूस, ग्रेट ब्रिटेन, फ्रांस, आस्ट्रिया-हंगरी, इटली तथा जर्मनी), चार बाल्कन राज्य (ग्रीस, सर्बिया, रोमानिया, मान्टीनिग्रो) और उस्मानी साम्राज्य ने भाग लिया था। बर्लिन कांग्रेस के परिणामस्वरूप तीन नये बाल्कन राष्ट्रों की स्वतन्त्रता को स्वीकृति प्रदान कर दी गई। इस प्रकार मॉण्टीनीग्रो, सर्बिया और रूमानिया-ये तीन स्वतन्त्र राष्ट्र स्वीकार कर लिए गए। बर्लिन सन्धि के परिणामस्वरूप बाल्कन क्षेत्र में टर्की का साम्राज्य पहले की तुलना में बहुत घट गया।

प्रश्न-9. रूस-जापान युद्ध (1904-05) पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए ?

उत्तर:- रूस-जापान युद्ध, 1904 से 1905 तक चले युद्ध का नाम है जिसमें रूसी साम्राज्य और जापानी साम्राज्य के बीच हुआ। यह युद्ध प्रथम विश्व युद्ध के पूर्ववर्ती घटना के रूप में महत्वपूर्ण था। इसकी मुख्य कारण थे व्यापारिक और सामरिक हितों के बीच संघर्ष, विशेष रूप से मंचूरिया में।

रूस और जापान के बीच युद्ध के परिणामस्वरूप जापान ने विजय प्राप्त की और वर्साय के शांति समझौते के तहत रूस से जोन-ड-क्यूरी और सखालिन के हक का कुछ हिस्सा प्राप्त किया। इसके परिणामस्वरूप जापान अपनी ग्लोबल प्रतिष्ठा को बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ा और रूसी साम्राज्य को इसके प्रभाव में घातक नुकसान पहुंचा। इसमें जापान की विजय हुई थी जिसके फलस्वरूप जापान को मंचूरिया तथा कोरिया का अधिकार मिला था। इस जीत ने विश्व के सभी प्रेक्षकों को आश्चर्यचकित कर दिया और जापान को विश्वमंच पर लाकर खड़ा कर दिया।

रूस-जापान युद्ध ने भी दिखाया कि एक एशियाई देश एक यूरोपीय महाशक्ति के खिलाफ जीत सकता है, जिससे अन्य एशियाई देशों के लिए प्रेरणा स्रोत बना।

प्रश्न-10. ‘नेपोलियन के नागरिक कानून’ पर एक लेख लिखिए ?

उत्तर:-1804 की नागरिक संहिता को नेपोलियन संहिता भी कहा जाता है। यह मूल रूप से कानून के समक्ष समानता की अवधारणा को परिभाषित कर रहा था। यह संपत्ति के अधिकार को सुरक्षा भी दे रहा था। इस अधिनियम ने जन्म के आधार पर सभी विशेषाधिकार समाप्त कर दिए

नेपोलियन के नागरिक कानून

नेपोलियन के नागरिक कानून (Code Napoléon या नैपोलियनी कोड) एक महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज है जो 1804 में फ्रांस में लागू किया गया था और फ्रांसीसी संघ के नेपोलियन बोनापार्ट के आदेशों पर तैयार किया गया था। यह कानून प्रणाली उस समय की फ्रांसीसी समाज में बड़े ही महत्वपूर्ण था और बाद में यूरोप और अन्य भागों में भी प्रभावी हुआ।

नेपोलियन के नागरिक कानून के मुख्य विशेषताएँ थीं-

  1. **सामान्यत: **यह कानून फ्रांस के सभी नागरिकों के लिए एक सामान्य कानूनी ढांचा प्रदान करता था, जिससे न्यायिक प्रक्रिया, संपत्ति के अधिकार, और अन्य मुद्दे स्पष्ट और सामान्य बन गए।
  2. **सामाजिक समानता: **इस कानून में सामाजिक और धार्मिक भिन्नताओं के आधार पर किसी को न्याय नहीं मिलता था। सभी नागरिक इसके तहत समान अधिकारों का उपयोग कर सकते थे।
  3. **संपत्ति के हक: **यह कानून संपत्ति के हक को सुरक्षित करता था और इसके लिए स्पष्ट नियम थे।
  4. **न्यायिक प्रक्रिया: **कानून न्यायिक प्रक्रिया को स्पष्ट और विश्वसनीय बनाता था, जिससे न्यायिक मामलों को सुलझाना आसान होता था।
  5. **व्यक्तिगत स्वतंत्रता: **नागरिकों को उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने का अधिकार था और कोई भी उनके खिलाफ अन्याय नहीं कर सकता था।

नेपोलियन के नागरिक कानून ने न्यायवादी और समाज में सुधार की बुनाई की और इसने यूरोप में कानूनी प्रणाली में बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान किया। इसका प्रभाव आज भी दुनियाभर के कानूनी प्रणालियों पर दिखाई देता है और यह न्यायिक प्रक्रिया और नागरिकों के अधिकारों के साथ संगत रहता है।

प्रश्न-11. मेज़िनी पर एक विस्तृत लेख लिखिए ? इटली के एकीकरण में योगदान पर एक लेख लिखिए ।

उत्तर:-आधुनिक इटली के जन्मदाता और इटली का एकीकरण करने वाले मेजिनी उन महान् मानवों में से एक थे,मेजनी साहित्यकार, गणतांत्रिक विचारों का समर्थक और योग्य सेनापति था। जिन्होंने मानव कल्याण की भावना से ही कार्य किया । साधनों की कमी के बाद भी अपनी अधिकांश शक्ति इटली के उत्थान में लगायी । वह सच्चा धार्मिक था, अत: मानव सेवा और देश सेवा को ही सच्ची पूजा समझता था ।जिसके लिए गणतांत्रिक विचार बड़े महत्वपूर्ण थे। इसके अलावा वह साहित्यकार था। एक शब्द में कहें तो मेजिनी इटली का मसीहा था जिसने लोगों को एकता के सूत्र में डाला। यही नहीं, ऑस्ट्रिया के प्रभाव से इटली को आजाद कराने की मेजिनी ने कोशिश की, हालाँकि उसके प्रयास नाकाफी रहे।मेजिनी (Giuseppe Mazzini) को इटली के राष्ट्रीय आन्दोलन का मसीहा कहा जाता है।

मेजनी साहित्यकार, गणतांत्रिक विचारों का समर्थक और योग्य सेनापति था। मेजनी सम्पूर्ण इटली का एकीकरण कर उसे एक गणराज्य बनाना चाहता था जबकि सार्डिनिया पिंडमौंट का शासक चार्ल्स एलबर्ट अपने नेतृत्व में सभी प्रांतों का विलय चाहता था । उधर पोप भी इटली को धर्मराज्य बनाने का पक्षधर था।

प्रश्न-12. प्रथम विश्व युद्ध के सामाजिक परिणामों के बारे में बताइए ?

उत्तर:- प्रथम विश्व युद्ध के सामाजिक परिणाम

  1. युद्धीय विनाश: प्रथम विश्व युद्ध ने जीवन की सभी पहलुओं पर विनाशकारी प्रभाव डाले। मिलिटरिज्म, जनसंख्या कमी, और अर्थव्यवस्थाओं की अस्तित्व में भारी हानि हुई।
  2. राष्ट्रीय अकेलाप: युद्ध के बाद, कई राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद अकेलाप में चले गए, जिससे विश्व समुदाय के बीच द्विपक्षीय संघर्षों की आशंका बढ़ी।
  3. आर्थिक मंदी: युद्ध ने आर्थिक विनाश का कारण बनाया, जिससे उद्योग, व्यापार, और नौकरियों में हानि हुई। आर्थिक मंदी ने बेरोजगारी और गरीबी की समस्याओं को बढ़ाया।
  4. महिलाओं के सामाजिक परिवर्तन: युद्ध के दौरान, महिलाएं नौकरियों और समाज में अधिक भागीदारी की ओर बढ़ीं, जिससे उनके सामाजिक स्थान में सुधार हुआ।
  5. सामाजिक परिवर्तन: युद्ध के परिणामस्वरूप, युवा पीढ़ियों के बीच एक विनियमित विचारधारा की आवश्यकता का आलंब बढ़ा, जिससे विभिन्न समाजी और सामाजिक आंदोलनों की शुरुआत हुई।
  6. राष्ट्रीय अलगाव: युद्ध के बाद, विभिन्न सामाजिक और धार्मिक समुदायों के बीच राष्ट्रीय अलगाव की समस्या बढ़ गई, जिससे समाज में तनाव बढ़ा।
  7. सामाजिक असमानता की चुनौती: युद्ध के बाद, असमानता की समस्या बढ़ी, जिसने न्यूनतम आय और अधिकतम आय के बीच भिन्नता बढ़ाया।
  8. सामाजिक सुधार: युद्ध के परिणामस्वरूप, समाज में विभिन्न सामाजिक सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई, जैसे कि महिलाओं के अधिकार, मानव अधिकार, और शिक्षा के क्षेत्र में सुधार।

प्रथम विश्व युद्ध के सामाजिक परिणाम विश्व इतिहास में महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इन्होंने विश्व समुदाय को बड़े परिवर्तनों की दिशा में प्रवृत्त किया और आधुनिक समाज की नींव रखी।

प्रश्न-13. विल्सन के चौदह सिद्धांतों की विवेचना कीजिए ?

उत्तर:- वुडरो विल्सन संयुक्त राज्य अमेरिका के 27वें राष्ट्रपति थे। वे नैतिकता और आध्यात्मिकता के पुजारी तथा विश्व-शान्ति के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने विश्व-शान्ति के निम्नांकित 14 सिद्धान्तों या सूत्रों का निर्माण किया था –

  • 1.     सभी राष्ट्र गुप्त सन्धियाँ व समझौते न करें।
  • 2.     समुद्रों की स्वतन्त्रता सभी देश स्वीकार करें।
  • 3.     सभी देश नि:शस्त्रीकरण का पालन करें।
  • 4.     अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की कठिनाइयों को दूर किया जाए।
  • 5.    औपनिवेशिक देशों की जनता की इच्छा का ध्यान रखा जाए।
  • 6.     रूस को पूर्ण विकास के अवसर दिए जाएँ।
  • 7.     जर्मनी, बेल्जियम को छोड़कर अपनी प्राचीन अवस्था ग्रहण कर ले।
  • 8.     फ्रांस भी अपनी पुरानी अवस्था पर पहुँच जाए।
  • 9.     इटली की सीमाएँ राष्ट्रीयता के सिद्धान्त के आधार पर निश्चित की जाएँ।
  • 10.   ऑस्ट्रिया-हंगरी को स्वायत्त शासन का अधिकार प्रदान किया जाए।
  • 11.   रूमानिया, सर्बिया तथा मॉण्टीनीग्रो से सेनाएँ हटा ली जाएँ।
  • 12.   तुर्की साम्राज्य के विरुद्ध तुर्की प्रदेशों की सम्प्रभुता सुरक्षित रखी जाए।
  • 13.   पोलैण्ड को समुद्र तट तक जाने का मार्ग दिया जाए।
  • 14.   लीग ऑफ नेशन्स की स्थापना की जाए।
प्रश्न-14. पुनर्जागरण को परिभाषित कीजिए एवं इसके कारण बताइए ?

उत्तर:-

प्रश्न-15. औद्योगिक क्रान्ति के प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए ।

उत्तर:-औद्योगिक क्रांति के प्रमुख कारण

  1. कृषि क्रांति: औद्योगिक क्रांति के महत्वपूर्ण कारणों में से एक कृषि क्रांति थी। नई और प्रौद्योगिक खेती के तरीकों का अपनाया गया और उत्पादन में वृद्धि हुई।
  2. जनसंख्या विस्फोट: जनसंख्या की तेजी से वृद्धि ने कार्यशील श्रमिकों की जरूरत को बढ़ा दिया, जो औद्योगिक क्रांति की आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करने वाले थे।
  3. व्यापार प्रतिबंधों की समाप्ति: व्यापार प्रतिबंधों की समाप्ति ने विश्व व्यापार में नए मार्गों को खोल दिया और व्यापारिक गतिविधियों को प्रोत्साहित किया।
  4. उपनिवेशों का कच्चा माल तथा बाजार: उपनिवेशों के उत्थान ने नए वस्त्र, ज्वेलरी, और अन्य उत्पादों के बाजार को बढ़ावा दिया।
  5. पूंजी और नयी प्रौद्योगिकी: नवाचार, पूंजी निवेश, और नयी प्रौद्योगिकी के आगमन ने औद्योगिक क्रांति की आधारशिला रखी।
  6. पुनर्जागरण काल और प्रबोधन: महान धार्मिक, सामाजिक, और राजनीतिक पुनर्जागरण आंदोलन ने जनसाधारण को उनके अधिकारों और स्वतंत्रता के प्रति जागरूक किया।
  7. राष्ट्रवाद: औद्योगिक क्रांति के दौरान राष्ट्रवाद का महत्वपूर्ण योगदान था, जिससे राष्ट्रीय एकता और आत्म-स्वाधीनता के लिए लड़ने की भावना उत्पन्न हुई।

औद्योगिक क्रांति के प्रमुख कारण:

  1. कृषि क्रांति
  2. जनसंख्या विस्फोट
  3. व्यापार प्रतिबंधों की समाप्ति
  4. उपनिवेशों का कच्चा माल तथा बाजार
  5. पूंजी तथा नयी प्रौद्योगिकी
  6. पुनर्जागरण काल और प्रबोधन
  7. राष्ट्रवाद
  8. कारखाना प्रणाली

इन कारणों ने साथ मिलकर औद्योगिक क्रांति की शुरुआत की और इसने औद्योगिक युग की शुरुआत की, जिसमें मानव समाज के तरीके और जीवनशैली में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए

प्रश्न-16. सितम्बर 1938 के म्यूनिख समझौते पर एक टिप्पणी लिखिए ?

उत्तर:-इस तुष्टिकरण का म्यूनिख समझौता (सितंबर 1938) एक प्रमुख उदाहरण था। इस समझौते में ब्रिटेन और फ्राँस ने जर्मनी को चेकोस्लोवाकिया के उन क्षेत्रों में प्रवेश करने की अनुमति दे दी, जहाँ जर्मन-भाषी लोग रहते थे।इस तुष्टिकरण का म्यूनिख समझौता (सितंबर 1938) एक प्रमुख उदाहरण था। इस समझौते में ब्रिटेन और फ्राँस ने जर्मनी को चेकोस्लोवाकिया के उन क्षेत्रों में प्रवेश करने की अनुमति दे दी, जहाँ जर्मन-भाषी लोग रहते थे।म्यूनिख समझौता जर्मनी, फ़्रांस और ब्रिटेन के द्वारा किया गया एक समझौता था जिसके तहत फ़्रांस और ब्रिटेन ने जर्मनी को चेकोस्लोवाकिया के उन क्षेत्रो में प्रवेश की अनुमति दे दिया था जहाँ जर्मन भाषी लोग निवास करते थे । 30 सितम्बर सन 1938 ईसवी को जर्मनी में म्यूनिख़ का ऐतिहासिक सम्मेलन आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में जर्मनी के नेता हिटलर, इटली के नेता मोसोलीनी, फ्रांस के प्रधान मंत्री एडवर्ड डेलाडी और ब्रिटेन के प्रधान मंत्री नेविल चैम्बर्लिन ने भाग लिया

प्रश्न-17. राष्ट्र संघ के उद्देश्यों पर एक लेख लिखिए ?

उत्तर:-संयुक्त राष्ट्र के मुख्य उद्देश्य हैं युद्ध रोकना, मानव अधिकारों की रक्षा करना, अंतर्राष्ट्रीय कानूनी प्रक्रिया, सामाजिक और आर्थिक विकास उभारना, जीवन स्तर सुधारना और बिमारियों की मुक्ति हेतु इलाज। सदस्य राष्ट्र को अंतर्राष्ट्रीय चिंताएं और राष्ट्रीय मामलों को संभालने का मौका मिलता है।इस राष्ट्रसंघ का उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना और अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा प्राप्त करना था । ” सुझाव दिये थे। सोलहवीं से अठाहरवीं शताब्दी के बीच भी शान्ति स्थापित करने से सम्बन्धित अनेक योजनाएं प्रस्तुत की गयी ।

राष्ट्र संघ के उद्देश्यों का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की साधना है। इसके अलावा, इसके उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

  1. सुलझाव और सांझेदारी की प्रोत्साहन: राष्ट्र संघ का प्रमुख उद्देश्य संघर्षों और विवादों के सुलझाव की प्रोत्साहन है। यह संघर्षों को शांति से हल करने की कोशिश करता है और बिना हिंसा के लिए समझौते और सांझेदारियों को समर्थन देता है।
  2. मानवाधिकारों का संरक्षण: राष्ट्र संघ मानवाधिकारों के संरक्षण की साधना करता है और उनके उल्लंघन के खिलाफ कदम उठाता है।
  3. विकास और सहयोग: यह उद्देश्य दुनिया के गरीब और पिछड़े देशों को सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से सहयोग करने का है।
  4. अंतर्राष्ट्रीय समझौता: यह उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय समझौतों और समर्थन की प्रोत्साहन की ओर है, जिसका मुख्य उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की सुनिश्चिति है।
  5. विश्वभर में सहयोग: यह उद्देश्य विभिन्न देशों के बीच सहयोग और व्यापार को बढ़ावा देने की प्रोत्साहना करता है ताकि सभी देश समृद्धि कर सकें।

राष्ट्र संघ के उद्देश्य विश्व शांति और सुरक्षा की सुनिश्चिति, मानवाधिकारों का संरक्षण, सहयोग, और संघर्षों के सुलझाव की प्रोत्साहन के लिए हैं। इसका उद्देश्य विश्व को एक मित्रभाषी और शांति पूर्ण स्थिति में ले जाना है।

प्रश्न-18. वॉल्टेयर पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए ?

उत्तर:-

प्रश्न-19. लियोनार्डो – द विंसी पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए ?

उत्तर:-

प्रश्न-20. Write a short note on Paris peace settlement ?

उत्तर:-

Section-C

प्रश्न-1. प्रथम विश्वयुद्ध के प्रमुख कारणों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए ?

उत्तर:- युद्ध के प्रमुख कारण

  • सैन्यवाद
  • विभिन्न संधियां यानि गठबंधन प्रणाली
  • साम्राज्यवाद
  • राष्ट्रवाद
  • वर्साय की संधि (1919)
  • राष्ट्र संघ की विफलता
  • 1929 की महामंदी

प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918) के प्रमुख कारणों की आलोचनात्मक परीक्षण करते हैं, जैसे कि दरअसल दिशाओं ने उस समय की आपसी समझ के बारे में सोचने के लिए किसी विशेष घटना या कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराने में सहायक रहा।

  1. राष्ट्रीय और सामरिक सिद्धांतों की प्रभावितता: दुनिया भर में बड़े राष्ट्रों में राष्ट्रीय और सामरिक सिद्धांतों का प्रभाव था, जिनमें उनका आदर्श और प्राधिकृत शक्ति को सुरक्षित रखने की भावना थी।
  2. द्विपक्षीय संघर्ष के संकेत: दोनों पक्षों के बीच विस्तारवादी दबाव के लिए संकेत बढ़ रहे थे, जैसे कि ब्रिटेन और जर्मनी के बीच विस्तारवादी दबाव और विश्वयुद्ध के प्रारंभ में यूरोपीय संघर्षों की भयंकरता।
  3. नैशनलिज्म का प्रसार: नैशनलिज्म की भावना ने विभिन्न देशों में एकता की भावना को बढ़ावा दिया, जिससे विभिन्न समुदायों के बीच तनाव बढ़ गए।
  4. आर्थिक संकट और वाणिज्यिक मुद्दे: आर्थिक संकट और वाणिज्यिक मुद्दों का प्रकोप बढ़ रहा था, जो व्यापारिक और राजनैतिक स्थितियों को कठिन बनाता था।
  5. विश्व राजनीतिक सम्राटीकरण: बड़े राष्ट्र विश्व राजनीतिक मामलों में अपने प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे, जिससे युद्ध की संभावना बढ़ गई।
  6. सर्बिया के हत्याकांड: जनवरी 1914 में फ्रांस फर्नांड के हत्याकांड के बाद, जिसमें आस्त्रिया-हंगरी के वार्जियारी सर्बियाई राजा की हत्या हुई, ने यूरोप में तनाव को बढ़ा दिया और युद्ध की संभावना बढ़ गई।
  7. मास्टर्डॉन के प्रशासनिक त्रुटियां: यूरोप के महत्वपूर्ण देशों के नेताओं ने आपसी समझौतों की बजाय युद्ध का सहारा लिया और वाणिज्यिक और सामरिक त्रुटियों का समाधान नहीं किया।
  8. दूसरे दुनिया के बाहरी घटक: विश्व युद्ध के आरंभ में, दूसरे दुनिया के देशों ने अपने राष्ट्रीय आर्थिक और सामरिक लाभों के लिए अपने हितों को बचाने के लिए संघर्ष में शामिल होने का निर्णय लिया।

इन प्रमुख कारणों ने प्रथम विश्वयुद्ध को ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, और उनके साथी राष्ट्रों के बीच एक भयंकर संघर्ष के रूप में रूप में रूप में किया और इससे यह युद्ध हो गया।

(जिस भी प्रश्न का उत्तर देखना हैं उस पर क्लिक करे)

प्रश्न-2. पूर्वी समस्या का विस्तृत ब्यौरा दीजिए ?

उत्तर:-पूर्वी समस्या यूरोप के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित तुर्की साम्राज्य की ईसाई जनता की आजादी की समस्या थी। वस्तुतः पतनोन्मुख तुर्की साम्राज्य ने यूरोप के इतिहास में 19वीं शताब्दी में जिस समस्या को जन्म दिया उसे पूर्वी समस्या कहते हैं। यह बहुत ही जटिल, उलझी हुई तथा विभिन्न देशों के परस्पर विरोधी हितों से सम्बन्धित थी।

पूर्वी समस्या, जिसे भी पूर्वी यूरोपीय या पूर्वी ब्लॉक के रूप में जाना जाता है, एक विशाल भूमि थी जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के दशकों में उत्तर यूरोप, मध्य यूरोप, और पूर्व यूरोप के कई देशों को समांतर दुर्भाग्य से प्रभावित किया। इस ब्यौरे में, हम पूर्वी समस्या के प्रमुख पहलुओं को जांचेंगे, जैसे कि इतिहास, राजनीति, और समाज।

  • 1. इतिहास: पूर्वी समस्या का आरंभ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ था, जब नाजी जर्मनी ने पूर्वी यूरोप के अनेक देशों को आक्रमण किया। इसके परिणामस्वरूप, जर्मनी की सत्ता के तहत कई देश उसके नियंत्रण में चलने लगे।
  • 2. राजनीति: पूर्वी समस्या के अन्य पहलु में राजनीतिक तनाव और आपसी संघर्ष था। यूरोपीय संघर्ष के कारण, देशों के बीच तनाव बढ़े और गुफाओं में गुप्त गतिविधियां होती रहीं।
  • 3. समाज: पूर्वी समस्या ने समाज को भी प्रभावित किया, खासकर जब यूरोपीय संघर्ष ने देशों के बीच भूमि और संसाधनों के वितरण को प्रभावित किया। इससे असामान्य परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, और लोगों को अपने जीवन में संघर्ष करना पड़ा।
  • 4. आर्थिक प्रभाव: पूर्वी समस्या ने अर्थशास्त्रिक और आर्थिक स्थिति को भी प्रभावित किया। यह यूरोप की आर्थिक स्थिति में सुधार को रोक दिया, और अनेक देशों को आर्थिक मुद्दों का सामना करना पड़ा।
  • 5. विभाजन: पूर्वी समस्या ने यूरोप को विभाजित किया और द्वंद्व बनाया, जिससे द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात्ताप और सामाजिक बदलाव में विघटन हुआ।

पूर्वी समस्या ने यूरोप को दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक बना दिया और विश्व इतिहास को स्थायी रूप से प्रभावित किया। यह एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया थी जो यूरोपीय राजनीतिक, आर्थिक, और सामाजिक स्थितियों को प्रभावित करके उसकी आधुनिक दिशा में सुधार की दिशा में गुज़री।

प्रश्न-3. 1917 ई. की रूसी क्रांति पर एक लेख लिखिए ?

उत्तर:-सन 1917 की रूस की क्रान्ति विश्व इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। इसके परिणामस्वरूप रूस से ज़ार के स्वेच्छाचारी शासन का अन्त हुआ तथा रूसी सोवियत संघात्मक समाजवादी गणराज्य की स्थापना हुई। यह क्रान्ति दो भागों में हुई थी – मार्च 1917 में, तथा अक्टूबर 1917 में। वर्ष 1917 की रूसी क्रांति मुख्य रूप से पिछड़ी अर्थव्यवस्था, किसानों एवं मज़दूरों की दयनीय स्थिति, निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी शासन के अत्याचार का परिणाम थी

रूसी क्रांति, जिसे अक्टूबर क्रांति भी कहा जाता है, एक ऐतिहासिक घटना थी जो 1917 ई. में रूस के अंतर्गत घटित हुई। इस क्रांति ने रूस की राजव्यवस्था को परिपूर्णता से बदल दिया और विश्व के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया।

पृथकता और दुखभरे दिन: क्रांति के पीछे कई कारण थे, जैसे कि सोसाइलिस्ट विचारधारा की प्रभावशीलता, विशाल युद्धों के प्रभाव, और सामाजिक असमानता। यह एक आंदोलन की शुरुआत थी, जिसमें लोगों ने राजव्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज उठाई।

फरवरी क्रांति: रूसी क्रांति का पहला चरण फरवरी क्रांति था, जो फरवरी 1917 में आई। इसमें लोगों का प्रदर्शन और आंदोलन राजव्यवस्था के खिलाफ थे और उन्होंने त्सार निचोलस II की सरकार के खिलाफ आवाज उठाई। इसके परिणामस्वरूप, निचोलस II ने त्याग कर दिया और सशस्त्र सेना ने भी क्रांति के समर्थन में आने का ऐलान किया।

अक्टूबर क्रांति: फरवरी क्रांति के बाद, रूस में सामाजिक और राजनीतिक बदलाव तेजी से होने लगे। इसका परिणामस्वरूप, अक्टूबर क्रांति, जिसे रेड ऑक्टोबर भी कहा जाता है, अक्टूबर 1917 में हुई, जिसमें बोल्षेविक पार्टी ने राज्य का कब्ज़ा किया। व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में, बोल्षेविक सरकार ने सोसाइलिस्ट प्रणाली की स्थापना की और रूस को सोवियत संघ का हिस्सा बना दिया।

प्रभाव: रूसी क्रांति ने दुनिया के इतिहास को प्रभावित किया। इसके परिणामस्वरूप, सोवियत संघ नामक सोसाइलिस्ट देश का निर्माण हुआ, जिसका प्रभाव दुनिया भर में महसूस हुआ। रूसी क्रांति के बाद, रूस सोवियत संघ का हिस्सा बन गई और एक समृद्धि और बदलाव की प्रक्रिया शुरू की, जिसका असर दुनिया भर में हुआ।

प्रश्न-4. यूरोप में धर्मसुधार आन्दोलन का मूल्यांकन कीजिए ?

उत्तर:- यूरोप में धर्मसुधार आंदोलन (Religious Reformation) 16वीं और 17वीं सदी में हुआ महत्वपूर्ण घटना था जिसने धर्मिक, सामाजिक, और राजनीतिक परिपर्णता में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। इसका मूल्यांकन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है:

1. धार्मिक स्वतंत्रता: यह आंदोलन ने अधिकांश यूरोपीय देशों में धर्मिक स्वतंत्रता की नींव रखी, जिससे लोगों को अपने धर्मिक विचारों के प्रति स्वतंत्रता मिली। मार्टिन लूथर और जॉन कैल्विन जैसे महान धार्मिक नेताओं ने नए धार्मिक सम्प्रदायों की स्थापना की, जैसे कि प्रोटेस्टेंटिज्म, जिसने रोमन कैथोलिक चर्च के खिलाफ खड़ी थी।

2. सामाजिक परिवर्तन: धर्मसुधार आंदोलन ने समाज में सामाजिक परिवर्तन को भी उत्पन्न किया। यह आंदोलन सामाजिक असमानता के खिलाफ था और लोगों को धर्म और समाज के प्रति जागरूक किया।

3. राजनीतिक प्रभाव: यूरोप के विभिन्न देशों में धर्मसुधार आंदोलन ने राजनीतिक परिवर्तन को भी प्रेरित किया। इसका परिणामस्वरूप, राजा और राजाओं को अपनी धर्मिक स्वतंत्रता को बचाने के लिए लड़ना पड़ा, जिससे राजा की सत्ता को प्रभावित किया।

4. शिक्षा का प्रसार: धर्मसुधार आंदोलन ने शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। नए सम्प्रदायों ने शिक्षा को लोगों के पहुंच में लाया और यूरोप में विज्ञान, फिलॉसफी, और साहित्य में नए विचारों की प्रेरणा दी।

धर्मसुधार आंदोलन ने यूरोपीय समाज को विस्तार से प्रभावित किया और धर्म, सामाजिक समरसता, और स्वतंत्रता के महत्व को साबित किया। यह आंदोलन यूरोप के नए धार्मिक, सामाजिक, और राजनीतिक दृष्टिकोण की शुरुआत को प्रकट करता है, जिसका प्रभाव आज भी महसूस किया जा सकता है।

प्रश्न-5. राष्ट्रसंघ की असफलता के प्रमुख कारण विस्तार से वर्णन कीजिए ?

उत्तर:- राष्ट्रसंघ की असफलता के कारण-

  1. संविधान की दुर्बलता (1): राष्ट्रसंघ का संविधान दुर्बल था क्योंकि उसमें सदस्य राष्ट्रों के स्वार्थों के खिलाफ कड़े नियम नहीं थे और इसका पालन नहीं किया गया।
  2. संरचना की दुर्बलता (2): संघ की संरचना में दुर्बलता थी क्योंकि उसके पास संरक्षित और प्रभावी कार्रवाई करने के लिए कम शक्ति थी।
  3. अमेरिका का असहयोग (3): अमेरिका ने संघ के साथ अक्सर असहयोग किया और संघ के कार्रवाई को रोकने में आधीन नहीं किया।
  4. वर्साय सन्धि की उपज (4): वर्साय सन्धि के फलस्वरूप, जिसमें प्रथम विश्व युद्ध के पराजय के बाद जर्मनी को अत्यधिक दंड दिया गया, ने जर्मनी के संघ के सदस्य बनने की संघ की संविधानिक दुर्बलता को बढ़ा दिया।
  5. सदस्य राष्ट्रों की स्वार्थपरता (5): सदस्य राष्ट्रों ने अक्सर अपने स्वार्थों को प्राथमिकता दी और संघ के निर्णयों का पालन नहीं किया, जिससे संघ के कार्रवाई को निरस्त किया जा सकता था।
  6. निःशस्त्रीकरण की विफलता (6): संघ की निःशस्त्रीकरण की कड़ी मांग के बावजूद, यह सफलता प्राप्त नहीं कर सका, जिससे राष्ट्रों के बीच संघर्ष और संघर्ष बढ़ गए।
  7. अधिनायकवाद का उदय (7): विश्वभर में अधिनायकवाद के उदय ने संघ के सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को खत्म किया और उसकी दुर्बलता को प्राधिकृत किया।
  8. विश्वव्यापी आर्थिक संकट (8): विश्वव्यापी आर्थिक संकट ने सदस्य राष्ट्रों को अपने स्वार्थों को बचाने के लिए ज्यादा संघर्ष करने के लिए मजबूर किया और संघ को उसके आर्थिक कार्यों में विफलता दिलाने की समस्या उत्पन्न की।

इन कारणों के कारण, राष्ट्रसंघ अपने मुख्य उद्देश्यों को पूरा नहीं कर सका और असफल रहा।

प्रश्न-6. धर्म सुधार आन्दोलन के धार्मिक कारणों की विवेचना कीजिए ?

उत्तर:-

प्रश्न-7. धर्म सुधार आन्दोलन के धार्मिक कारणों की विवेचना कीजिए ?

उत्तर:-

प्रश्न-8. बिस्मार्क की ‘रक्त व लौह’ नीति को समझाइए ?

उत्तर:-इसका अर्थ था कि प्रशा के भविष्य का निर्माण सेना करेगी न कि संसद। ‘रक्त और लोहे की नीति’ का अभिप्राय था, युद्ध। बिस्मार्क का निश्चित मत था कि जर्मनी का एकीकरण कभी भी फ्रांस, रूस, इंग्लैण्ड एवं ऑस्ट्रिया को स्वीकार नहीं होगा क्योंकि संयुक्त जर्मनी यूरोप के शक्ति सन्तुलन के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा।

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